देवबंद (सहारनपुर)। सुप्रीम कोर्ट ने भले ही विभिन्न शर्तों के आधार इच्छा मृत्यु की इजाजत देने का फैसला सुना दिया हो, लेकिन देवबंदी उलमा इसे शरीयत के खिलाफ बता रहे हैं। उलमा का कहना है कि जज्बा-ए-रहम के चलते इंजेक्शन या किसी अन्य दवा के जरिए किसी का कत्ल कर देना इसकी शरीयत में कतई इजाजत नहीं है।
फतवा ऑनलाइन के चेयरमैन मौलाना मुफ्ती अरशद फारुकी का कहना है कि शरीयत का हुक्म ये है कि अगर कोई व्यक्ति वेंटिलेटर की वजह से सांस ले रहा है, लेकिन मालूम ये हो रहा है कि उसकी मौत हो चुकी है उसे हटाने की इजाजत है। कहा कि आज मेडिकल की दुनिया में बहुत से ऐसे मेडिकल सेंटर हैं जो मरने के बाद वेंटिलेटर पर रखकर उसे जिंदा बताकर पैसे बनाते हैं ये अव्यवहारिक है, लेकिन अगर माहिर डॉक्टर ये महसूस करें कि इन उपकरणों को हटा दिया जाए तो मौत है तो हटाने का अधिकार है। मौलाना फारुकी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में एहतियात बरती है कि इसके लिए कड़े कानून बनाए जाएंगे और कई शर्तें रखी जाएंगी। साथ ही कहा कि दो चीजें हैं एक तो रहम के जज्बे से कत्ल करना यानि इंजेक्शन लगाकर या कोई अन्य दवा देकर कत्ल करना इस्लाम में इसकी इजाजत नहीं है। दूसरी ये कि अगर कोई व्यक्ति वेेंटिलेटर पर है तो उसे हटाया जा सकता है। वहीं, श्री त्रिपुर मां बाला सुंदरी देवी मंदिर सेवा ट्रस्ट के अध्यक्ष पंडित सतेंद्र शर्मा का कहना है शास्त्रों के अनुसार जीवन मरण ईश्वर के हाथ है। जिस तरह जीवन ईश्वर देता है उसी तरह मृत्यु का फैसला भी उसी का होता है। इच्छा मृत्यु आत्महत्या के समान है। लेकिन अगर परिस्थितियां प्रतिकूल हैं और उसकी एकमात्र हल यही है तो जांच के बाद इच्छा मृत्यु का कदम उठाया जा सकता है।