जिन पर खर्च करना वाजिब, उनको जकात देना जायज नहीं
सहारनपुर। जमीयत दावतुल मुसलीमीन के संरक्षक व इमाम कारी सैय्यद इसहाक गोरा ने हेल्प लाइन पर रोजेदारों के सवालों के जवाब देकर उनकी शंकाओं को दूर किया।
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सवाल- मूलरूप से दिल्ली निवासी मुमताज ने पूछा कि वह अब गुजरात में रहती हैं। उनके सात बच्चे हैं। हर वर्ष अपने माता-पिता को फितराना भेजती हैं। माता-पिता का खर्च भी वह ही बर्दाश्त करती हैं। शरीयत के अनुसार क्या वह अपने माता-पिता को जकात और सदका-ए-फितर दे सकती हैं।
जवाब- शरीयत के मुताबिक जिस पर खर्च करना वाजिब हो, जैसे माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी, बेटा-बेटी, पत्नी आदि को जकात या सदका-ए फितर देना जायज नहीं है।
सवाल- नकुड़ निवासी साद अहमद ने पूछा कि रमजान के आखिरी दस दिनों में शब-ए-कदर कौन-कौन सी रातें होती हैं। इस्लाम में इन रातों की क्या फजीलत है। हमें यह रातें कैसे गुजारनी चाहिए?
जवाब- शब-ए-कदर रमजान में आने वाली बड़ी मुबारक राते हैं। 21, 23, 25, 27 व 29वीं शब में पूरी रात अल्लाह की इबादत में गुजार कर अपने गुनाहों की तलाफी करनी चाहिए। शब--ए कदर में सच्चे मन से तौबा करने वालों के गुनाहों को अल्लाह माफ फरमाता है।