स्वरोजगार का साधन बन रही मशरूम की खेती
सहारनपुर। अच्छे उत्पादन और बढ़िया आमदनी के चलते ग्रामीण युवाओं का रुझान मशरूम की खेती की ओर हो रहा है। जनपद में करीब 250 किसान इसकी खेती कर रहे हैं। वर्ष में इसकी तीन फसलें ली जा रही हैं। जिले में लगभग चार हजार क्विंटल प्रतिवर्ष मशरूम का उत्पादन हो रहा है।
परम्परागत खेती के साथ ही किसान मशरूम की खेती को भी तेजी से अपना रहे हैं। ग्रामीण युवाओं के लिए यह खेती स्वरोजगार का अच्छा साधन बन रही है। जिले में पूरे वर्ष मशरूम की खेती होती है। इसमें मिल्की मशरूम जून से लेकर सितंबर तक, सफेद बटन मशरूम की खेती अक्टूबर से लेकर फरवरी तक एवं ढिंगरी मशरूम की फसल मार्च से लेकर मई महीने तक ली जाती है। कम लागत में बढिया मुनाफे के चलते ग्रामीण युवा इसकी खेती को तेजी से अपना रहे हैं। मशरूम की खेती के बाद बचे कंपोस्ट को खेत में खाद की तरह प्रयोग किया जाता है। इसकी खेती के लिए कम स्थान की आवश्यकता होती है। इसके चलते छोटे और भूमिहीन किसान भी इसकी खेती कर सकते हैं। यहां से दिल्ली, चंडीगढ, दिल्ली, देहरादून सहित अन्य महानगर में इसकी सप्लाई होती है। कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी और मशरूम के विशेषज्ञ डॉ. आईके कुशवाहा ने बताया कि सौ क्विंटल कम्पोस्ट में सफेद बटन मशरूम का औसत उत्पादन 30 से 35 क्विंटल, ढिंगरी का 50 से 60 क्विंटल और मिल्की मशरूम का 45 से 50 क्विंटल तक हो जाता है। उन्होंने बताया कि मशरूम का औसत भाव 60 से 100 रुपये तक मिल जाता है।