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दो बेटों के जनाजे को कंधा देकर टूट चुका इश्तियाक

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बुढ़ापे का आखिरी सहारा भी गया तो टूट गया इश्तियाक
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देवबंद (सहारनपुर)। बेटों को बुढ़ापे में बाप की लाठी कहा जाता है। लेकिन अगर उन्हीं बेटों के जनाजे बाप के कांधे पर उठे, तो हर किसी का टूट जाना लाजिमी है। दीवार के नीचे दबकर मौत का शिकार हुए असद के पिता इश्तियाक बेटे के जनाजे को कंधा देकर किस हद तक टूट चुका है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि असद के जनाजे में उसके पैर उसका साथ नहीं दे रहे थे। लोग इश्तियाक को पकड़कर कब्रिस्तान तक ले गए।
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मोहल्ला टपरी निवासी मुस्लिम फंड ट्रस्ट के कर्मचारी इश्तियाक के पांच बेटियां के अलावा दो बेटे मो. असद और मो. शाहिद थे। करीब दस वर्ष पूर्व शाहिद को बुखार और पीलिया ने अपनी चपेट में ले लिया। जिसके चलते उसकी मौत हो गई थी। एक बेटे की मौत से गमजदा पिता इश्तियाक को असद से बुढ़ापे में सहारे की उम्मीद थी। करीब छह साल पूर्व धूमधाम से उसकी शादी की। जिसके बाद असद के तीन बच्चे हुए। अब जल्द ही उसकी पत्नी एक ओर बच्चे को जन्म देने वाली है। अचानक मौत ने ऐसा झपटा मारा कि इश्तियाक के बुढ़ापे की दूसरी लाठी भी छीन गई। जिससे वह और उसका परिवार पूरी तरह टूट चुका है। पिता के बुढ़ापे का सहारा और मासूम बच्चों के सिर से पिता का साया उठ गया था। जिस पर हर किसी की आंखें नम थी।
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