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जरी-जरदोजी के कारोबार को 50 करोड़ की चोट

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रामपुर। दवा और आवश्यक वस्तुओं को छोड़ दें तो शायद ही कोई ऐसा कारोबार बचा होगा जिसे कोरोना और लॉकडाउन ने चोट नहीं पहुंचाई है। रामपुर का प्रसिद्ध कारचोब और जरी-जरदोजी का कारोबार तो इससे बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। 2021 का पीक सीजन लॉकडाउन में निकल गया। ऐसे में इस कारोबार को लगभग 50 करोड़ रुपये का चोट पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है। काम नहीं मिलने के असर यह रहा कि कारचोब और जरी-जरदोजी के कारीगरों को ई-रिक्शा चलाने, सब्जी बेचने और मजदूरी करने पर मजबूर होना पड़ा।
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रामपुर में कारचोब और जरी-जरदोजी का काम रिसायत काल से चला आ रहा है। कारचोब और जरी का काम यहां कुटीर उद्योग के रूप में होता है और घर-घर के लोग इससे जुड़े हैं। एक अनुमान के मुताबिक इस कारोबार से प्रत्यक्ष रूप से लगभग 50 हजार लोग जुड़े हुए हैं, जिनमें से कई महिलाएं भी हैं। एक अनुमान के मुताबिक पूरे साल में लगभग 200 करोड़ रुपये का जरी-जरदोजी का कारोबार होता है। पिछले दो महीने के दौरान इस कारोबार को 50 करोड़ रुपये का नुकसान इस लिहाज से हुआ है कि ईद और शादियों का सीजन लॉकडाउन में गुजर गया है। ईद और शादियों के सीजन में ही जरी के कपड़ों की सबसे अधिक मांग होती है। इसके अलावा दूसरे शहरों से यहां के कारीगरों को मिलने वाला काम भी बंद हो गया। आमतौर पर यहां के कारीगरों के पास लखनऊ और दिल्ली सहित अन्य शहरों के कारोबारी कपड़े और डिजाइन भेज देते हैं और उस पर जरी का काम कर कारीगर उसे वापस भेज देते हैं। लॉकडाउन के दौरान यह प्रक्रिया पूरी तरह से बंद रही। इस वजह से कारचोब और जरी-जरदोजी के कारीगरों के सामने रोजी-रोटी की समस्या उठ खड़ी हुई।
क्या कहना है कारीगरों का
कारचोब का काम हम बचपन जानते है। अभी तक 200-250 रुपये का काम प्रतिदिन मिल जाता था, लेकिन पिछले दो महीनों से यह काम बंद है। घर में जो कुछ बचा खुचा पैसा था वह भी लॉकडाउन के दौरान खत्म हो गया है। ऐसे में अब हम मजदूरी करने को मजबूर हैं। यह काम भी प्रतिदिन नहीं मिलता है।
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मोबिन
कारचोब के काम से ही हमारा घर चलता है। पिछले दो महीनों से कारचोब का काम मिलना बंद हो गया है। ऐसे में घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा है। कारचोब के अलावा हम को दूसरा काम भी नहीं जानते हैं। बच्चों का पेट भरने के लिए कुछ ना कुछ करना तो है ही। ऐसे में हम मजदूरी करने को विवश है। मजदूरी का काम भी नहीं मिल रहा है।
जुबैर
कारचोब का काम रामपुर की पहचान है। घरों में महिलाएं इस काम करती हैं। इससे जुड़े हर परिवार की आमदनी बंद हो गई है। हमारे बारे में सोचने वाला कोई नहीं है। सरकार और जिला प्रशासन को भी हमारी परवाह नहीं है। कुछ पूछने भी नहीं आ रहा है कि घर में कुछ खाने को है या नहीं। कारचोब के कारीगर रिक्शा चलाने, ठेला लगाने और मजदूरी करने को मजबूर हैं।
आसिफ
क्या कहते हैं कारोबारी
कोरोना संक्रमण और लॉकडाउन की वजह से कारचोब और जरी-जरदोजी के काम पिछले दो माह से बंद चल रहे हैं। इस साल का साल पीक सीजन लॉकडाउन में निकल गया। दुकानों में भी स्टॉक पड़ा हुआ है। इस वजह से कारीगरों को काम नहीं मिल पा रहा है। सरकार से जरी-जरदोजी और कारचोब के कारीगरों को आर्थिक मदद दिलाए जाने की मांग की जाएगी।
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श्रीष गुप्ता, हस्तकला प्राइवेट लिमिटेड
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