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यहां रावण नहीं कंस का होता दहन: परंपरा से परे अनूठा लोक-उत्सव, यूपी के इस जिले में जलते हैं कंस के पुतले

Sat, 17 Oct 2026 05:56 PM IST
Akash Dubey देव शर्मा, रामपुर

सार

 उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले में विजयादशमी व अन्य पर्वों पर रावण की तर्ज पर कंस का पुतला दहन होता है। यह अनूठी स्थानीय परंपरा ग्रंथों में वर्णित नहीं है।
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रावण की जगह कंस के पुतले का होता दहन - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सनातन संस्कृति में विजयादशमी के पावन पर्व पर लंका नरेश रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले दहन की परंपरा देश भर में सर्वविदित है। रामकथा पर आधारित इस परंपरा को तो सभी जानते हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले में एक ऐसी अनूठी और जीवंत स्थानीय परंपरा है, जो धार्मिक ग्रंथों के पन्नों से इतर लोक-संस्कृति में गहराई से रची-बसी है। रामपुर के बिलासपुर और शाहबाद कस्बों में हर साल विजयादशमी या अन्य धार्मिक उत्सवों के दौरान रावण की तर्ज पर ही मथुरा नरेश कंस का पुतला भी जलाया जाता है।

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ग्रंथों में वध का वर्णन, पर पुतला दहन का जिक्र नहीं
श्रीमद्भागवत महापुराण, विष्णु पुराण और हरिवंश पुराण जैसे प्रमुख सनातन धर्म ग्रंथों में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा मथुरा जाकर रंगभूमि में कंस के वध का विस्तृत और सजीव वर्णन मिलता है। अधर्म और अत्याचार के प्रतीक कंस के अंत को असत्य पर सत्य की जीत के रूप में दर्शाया गया है। शास्त्रों में कंस वध के बाद देवताओं द्वारा पुष्प वर्षा करने और आनंद उत्सव मनाने का उल्लेख तो अवश्य है, परंतु प्रतीकात्मक रूप से कंस का पुतला दहन (पुतला जलाने) की किसी प्राचीन परंपरा का सीधा उल्लेख इन ग्रंथों में नहीं मिलता है। इसके बावजूद, रामपुर जिले की लोक-संस्कृति ने इस प्रसंग को अपने अंदाज में जीवंत रखा है, जो इसे देश के अन्य हिस्सों से अलग और खास बनाता है।

रामपुर जिले के प्रमुख आयोजन स्थल: जहां गूंजता है कंस वध का उल्लास

शाहबाद: 

रामपुर के शाहबाद कस्बे में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व अन्य पर्वों के अवसर पर भव्य धार्मिक झांकियों की शोभायात्रा निकाली जाती है। नगर के विभिन्न चौराहों से गुजरने वाली यह यात्रा जब बुड्ढाबड़ पहुंचती है, तो वहां कंस के ऊंचे और आकर्षक पुतले का दहन किया जाता है। इस दौरान यहां एक विशाल मेले का आयोजन होता है, जिसमें बड़ी संख्या में दूर-दराज से लोग शामिल होते हैं।

बिलासपुर:
बिलासपुर कस्बे के कायस्थान मोहल्ला स्थित श्रीकृष्ण लीला मैदान में हर साल अनूठी कृष्ण लीला का मंचन किया जाता है। इस लीला के अंतिम चरण में भगवान श्रीकृष्ण का रूप धरे कलाकार द्वारा कंस वध का सजीव मंचन किया जाता है। इसके पश्चात, रावण दहन की भांति ही कंस के पुतले को अग्नि के हवाले कर दिया जाता है। इस क्षण को देखने के लिए भारी भीड़ उमड़ती है और पूरा क्षेत्र 'जय कन्हैया लाल की' के जयकारों से गूँज उठता है।

लोक-आस्था का अनूठा संगम
धार्मिक ग्रंथों की सीमाओं से परे, रामपुर की यह स्थानीय परंपरा इस बात का प्रमाण है कि लोक-संस्कृति किस प्रकार ऐतिहासिक और पौराणिक कथाओं को अपनी सृजनात्मकता के साथ जीवित रखती है। बिलासपुर और शाहबाद की यह परंपरा न केवल धार्मिक उल्लास का प्रतीक है, बल्कि यह आपसी मेल-मिलाप और सांस्कृतिक धरोहर का एक अनूठा उदाहरण भी बन चुकी है।
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- पिछले 69 साल से श्रीकृष्ण लीला का वार्षिक महोत्सव मना रहे हैं। कंस का पुतला उनके पिताजी पूर्व विधायक मुंशीलाल जौहरी के समय से ही जलता आ रहा है। वह अब पुरानी परंपरा का ही कमेटी के सहयोग से निर्वहन कर रहे हैं। -संतोष कुमार जौहरी, संरक्षक, श्रीकृष्ण लीला कमेटी बिलासपुर, रामपुर
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