रामपुर। दशकों पहले शहरी क्षेत्र के जिस मैदान में हर वर्ष मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के जयकारों और उनकी लीलाओं की गूंज सुनाई देती है, उसकी कहानी रामपुर रियासत के नवाबी दौर के आखिरी वर्षों से जुड़ी है। 79 साल पहले शुरू हुई श्रीरामलीला ने न केवल बदलते इतिहास को देखा, बल्कि नवाबी हुकूमत से लेकर आज के दौर तक परंपरा को भी जीवंत रखा।
वर्ष 1947 में पनवड़िया के पास नुमाइश मैदान से शुरू हुई रामलीला को दो साल बाद ऐसा ठिकाना मिला, जिसने उसे शहर की सांस्कृतिक पहचान का स्थायी हिस्सा बना दिया। वर्ष 1949 में आखिरी नवाब रजा अली खां ने कोसी मंदिर मार्ग पर करीब 80 बीघा जमीन रामलीला के आयोजन के लिए उपलब्ध कराई। यही जमीन आगे चलकर विशाल रामलीला मैदान के रूप में प्रसिद्ध हुई।
सनातन धर्म रामलीला कमेटी के महामंत्री वीरेंद्र कुमार गर्ग बताते हैं कि रामलीला की शुरुआत 1947 में उस समय हुई, जब देश आजादी की दहलीज पर था। पनवड़िया के पास नुमाइश मैदान में रामलीला का मंचन शुरू तो हो गया लेकिन शहर की आबादी से दूर होने के कारण दर्शकों को वहां पहुंचने में परेशानी होती थी। रामकथा का मंचन देखने के लिए लोगों में बड़ा आकर्षण था। ऐसे में शहर के नजदीक बड़े मैदान की जरूरत महसूस होने लगी। इस बीच रामपुर रियासत के आखिरी नवाब रजा अली खां ने मशविरा कर रामलीला के लिए जमीन उपलब्ध कराई। वर्ष 1949 में कोसी मंदिर मार्ग पर करीब 80 बीघा जमीन रामलीला के आयोजन के लिए दी गई। यह फैसला उस समय और भी महत्वपूर्ण था, क्योंकि रामपुर में नवाबी शासन का अंतिम दौर चल रहा था। इसके कुछ ही समय बाद 30 जून 1949 को नवाबी शासन समाप्त हो गया और एक जुलाई 1949 से रामपुर रियासत भारतीय संघ का हिस्सा बन गई। इस तरह रामलीला के वर्तमान मैदान का इतिहास रामपुर के नवाबी शासन के अंतिम अध्याय से सीधे जुड़ गया।
कोसी मंदिर मार्ग पर विशाल मैदान मिलने के बाद रामपुर की रामलीला ने धीरे-धीरे बड़ा रूप लेना शुरू किया। दशहरे के दिनों में यहां हजारों की भीड़ उमड़ने लगी। आज श्री सनातन रामलीला कमेटी इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है। वर्ष 2026 में भी उत्सव पैलेस, रामलीला मैदान कोसी मंदिर मार्ग पर रामलीला का आयोजन किया जा रहा है। इस बार वृंदावन के कलाकार रामलीला के साथ श्रीकृष्ण लीला के प्रमुख प्रसंगों का भी मंचन करेंगे। यानी करीब 79 वर्ष पहले जिस परंपरा ने रामपुर में आकार लिया था, उसकी गूंज आज भी उसी मैदान में सुनाई दे रही है।
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आधुनिक सुविधाएं नहीं पर हजारों दर्शकों की उमड़ती थी भीड़
महामंत्री वीरेंद्र कुमार बताते हैं कि पहले के दाैर में न तो आधुनिक दर्शक दीर्घा थी और न ही आज जैसी सुविधाएं। इसके बावजूद 25 से 35 हजार तक लोग मैदान में जमीन पर बैठकर घंटों रामलीला देखते थे। मंच पर होने वाला अभिनय, संवाद, संगीत और धार्मिक प्रसंग लोगों को देर रात तक बांधे रखते थे। समय-समय पर अयोध्या, मथुरा और वृंदावन से कलाकारों और मंडलियों को बुलाया जाता रहा जो आज भी आकर मंचन कर श्रद्धालुओं में आस्था भाव जगाते हैं।