रामपुर। पाकिस्तान के नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविएंस से आए शरणार्थियों ने साल 1950 में नगर के फराशखाना मोहल्ले में एक गुरुद्वारे की नींव रखी थी। यह गुरुद्वारा आज करीब 69 साल का सफर तय करते-करते लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन चुका है।
जिले में गुरुद्वारों का इतिहास दशकों पुराना है। इनमें से अधिकतर गुरुद्वारों का निर्माण भारत-पाकिस्तान के विभाजन के समय ही हुआ। पाकिस्तान से भारत आए सिख समुदाय के शरणार्थियों को भारत सरकार ने न सिर्फ रहने के लिए जगह मुहैया कराई बल्कि उनकी धार्मिक भावनाओं का भी पूरा ख्याल रखा। नगर के फराशखाना मोहल्ले में स्थित गुरुद्वारा भी दशकों पुराना है। गुरुद्वारे की देखभाल से लेकर अन्य सभी व्यवस्थाएं सिख समुदाय के लोग खुद ही संभालते हैं। इसके लिए किसी भी प्रबंधक कमेटी का गठन नहीं किया गया है। गुरुद्वारा की व्यवस्था संभाल रहे सुमित कुमार बताते हैं कि उनके पूर्वज नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविएंस जो कि आज पाकिस्तान के खैवर पख्तूनवा का हिस्सा से वहां से आए थे। साल 1950 में रामपुर आने के बाद गुरुद्वारे की नींव तोकनदास ने रखी जो कि नेत्रहीन थे। इसके बाद भी उन्होंने गुरुद्वारे के निर्माण में काफी सहयोग किया। एक कमरे में यह गुरुद्वारा शुरू हुआ। इसके बाद गोविंद राय, सेठ बालमुकुंद द्वारा गुरुद्वारे की सेवा पूरे तन, मन और धन से की गई। उनके बाद सोहन लाल कुमार और सोहन लाल भाटिया, रोशन लाल भाटिया ने इस गुरुद्वारे में सेवा की। सेठ बालमुकुंद के परिजन आज भी इस गुरुद्वारे की सेवा कर रहे हैं। सुमित कुमार बताते हैं कि इस गुरुद्वारे के निर्माण और उनके पूर्वजों को फराशखाने में बसाने में उस वक्त के जिलाधिकारी गंगा सिंह चूड़ामणि और नवाब परिवार की ओर से काफी मदद की गई।