रायबरेली। साहित्यिक संस्था हिंदी-उर्दू मंच के तत्वावधान में काव्य गोष्ठी का आयोजन अली मियां काॅलोनी स्थित काशाना-ए-अदब में किया गया। इसमें पहले से तय पंक्ति सांस लेने लगे हैं पत्थर भी.. पर केंद्रित रचनाएं प्रस्तुत की गईं। कवियों और शायरों ने एक से बढ़कर एक काव्य रचना सुनाकर सभी का दिल जीत लिया।
शायर हसन अब्बास जायसी ने देशप्रेम पर अपनी काव्य पंक्तियां कुछ इस तरह पढ़ी- ऐ वतन तेरी शान की खातिर, मैं भी हाजिर हूं और मेरा सर भी। लईक अंसारी ने कहा- जब भी खूने जिगर से लिखता हूं, बोलते हैं गजल के पैकर भी। अध्यक्षता कर रहे उस्ताद शायर नाज प्रतापगढ़ी ने पढ़ा- अब तो वीरान हो चुका घर भी, अब न आएंगे घर में पत्थर भी।
संचालन कर रहे सुधीर बेकस ने कहा- उसके जेवर उतारे जाते हैं, जिसका उतरा नहीं महावर भी। गुलाम हैदर ने पहले मजमे को वह हंसाता रहा, फिर अकेले में रोया जोकर भी... पंक्तियों के जरिए खूब तालियां बटोरीं। शब्बीर अहमद सूरी अमेठवी ने कहा- वक्त बदला है और मंजर भी, बात करनी पड़ेगी इस पर भी।
आगा जायसी ने पढ़ा- धंस के रह गई दौलते-करून, हाथ खाली गया सिकंदर भी। ज्ञानेंद्र पांडेय मधुरस ने कहा- भाव शिव का जगा जो उर में तो, सांस लेने लगे हैं पत्थर भी। जय चक्रवर्ती ने जख्म देते हैं देख कर चेहरा, सांप्रदायिक हुए हैं पत्थर भी.. पंक्ति के जरिए अपनी बात रखी। रमाकांत ने कहा- थोड़ा रोकर भी थोड़ा हंस कर भी, जिंदगी खेलती है चौसर भी।
शमसुद्दीन अजहर ने पढ़ा- अब मआनी बदल गए इसके, इक तमाशा है ढाई आखर भी। रमजान अली सफीर ने कहा- यूं बदलते नहीं मुकद्दर भी, मुन्हसर होता है अमल पर भी। हिदायत उल्ला शौक ने कहा- है हुनर संगतराश का शामिल, सांस लेने लगे हैं पत्थर भी।
राजेंद्र बहादुर सिंह राज ने पढ़ा- आज तूफान आया जोरों से, आब ही आब और पत्थर भी। प्रदीप प्यारे ने इश्क का हल न कर सका पर्चा, चाहता है वह पूरे नंबर भी.. पंक्तियां सुनाकर खूब तालियां बटोरीं। परमहंस मौर्य ने कहा- बेवफाई की हद भी होती है, बन गया गैर अब तो दिलबर भी। राघवेंद्र सिंह राघव ने कहा- आज भारी बहुत मेरा सिर भी, और जाना पड़ेगा दफ्तर भी।
इस मौके पर कैलाश शर्मा, जमाल अहमद, जावेद अख्तर, अल्ख्फ हुसैन, मो. नईम, मो. अहमद, अब्सार अहमद, अब्दुल सगीर आदि उपस्थित रहे। अगली काव्य गोष्ठी के लिए किस्मत से कभी मुझको शिकायत नहीं होती.. पंक्ति निर्धारित की गई।