सरकारी अस्पताल हो या फिर प्राइवेट नर्सिंग होम। यहां पर रोगियों को आग से बचाने के प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं। ऐसे में यदि आग लग जाए तो लोगों की जिंदगी बचाना मुश्किल हो जाए।
भुवनेश्वर में एक निजी नर्सिंग होम में लगी आग से 23 लोगों की मौत के बाद अस्पतालों में आग के बचाव के प्रबंध न होने को लेकर सवाल खड़ा हो गया है। जिला चिकित्सालय की प्रतिदिन ओपीडी में 1600 रोगी आते हैं, लेकिन यहां पर किसी डॉक्टर के कक्ष तक में अग्निशमन यंत्र नहीं लगाए गए हैं।
अल्ट्रासाउंड, एक्सरे कक्ष में भी अग्निशमन यंत्र की व्यवस्था नहीं है। दवा भंडार कक्ष में यंत्र लगाया गया है, जो महज शोपीस बना है। जिन वार्डों में रोगी भर्ती हैं, वहां पर भी आग से बचाव के कोई इंतजाम नहीं किए गए हैं।
सबसे खराब स्थिति, देहात क्षेत्र की सीएचसी व पीएचसी की है। ज्यादातर सीएचसी-पीएचसी में आग से बचाव के प्रबंध नहीं हैं। जिन अस्पतालों में अग्निशमन यंत्र लगे भी हैं तो खराब पड़े हैं। जिला अस्पताल इलाज कराने आए रोगी संतोष त्रिवेदी, अर्जुन प्रसाद, धनंजय सिंह, मो. शफीक का कहना था कि ओपीडी में सबसे अधिक रोगियों की भीड़ रहती है।
यदि किसी कारण वश आग लग जाए तो रोगियों को जान से हाथ धोना पड़ सकता है। पर इससे निपटने के कोई इंतजाम नहीं किए गए हैं। इसके अलावा जिले के 50 फीसदी प्राइवेट नर्सिंग होमों में भी आग से बचाव के र्कोई इंतजाम नहीं किए गए हैं।
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी इसको लेकर गंभीर नजर नहीं आ रहे हैं। जिला अस्पताल के सीएमएस डॉ. एनके श्रीवास्तव का कहना है कि अस्पताल में आग से बचाव के प्रबंध किए जा रहे हैं। अग्निशमन यंत्र लगवा गए हैं। पूरा ख्याल रखा जाता है कि आग जैसी घटना अस्पताल के अंदर न हो।
वहीं मुख्य जिला अग्निशमन अधिकारी राजीव पांडेय का कहना है कि जिले में 50 फीसदी ऐसे नर्सिंग होम, जहां पर आग से बचाव के कोई इंतजाम अभी तक नहीं किए गए हैं। भुवनेश्वर की घटना के बाद नर्सिंग होमों की जांच कराई जाएगी। जहां पर भी आग से बचाव के प्रबंध नहीं होंगे, उन्हें नोटिस दिया जाएगा। रोगियों की जिंदगी के साथ खिलावड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।