चहारदीवारी बनाकर कब्रिस्तानों के अस्तित्व को बचाने का प्रयास यहां पर फेल हो गया है। सरकार की तरफ से लाखों रुपये का बजट देने के बावजूद चहारदीवारी निर्माण में बड़ा ‘खेल’ होने की आशंका है।
लापरवाही का आलम ये है कि पिछले साल चहारदीवारी बनाने का जो लक्ष्य रखा गया था, वह पूरा नहीं हो पाया। महज पांच कब्रिस्तानों में ही चहारदीवारी बनाई गई, उसमें भी मानक का ध्यान नहीं रखा गया। खास बात ये है कि इस साल भी सरकार की तरफ से धन भेजा गया, लेकिन पिछला रुपया खर्च न होने पर जिला प्रशासन ने बजट को वापस कर दिया है।
प्रदेश सरकार कब्रिस्तानों की चहारदीवारी योजना की भी जांच कराने जा रही है। यह योजना पूर्ववर्ती सपा सरकार ने चलाई थी। रायबरेली जिला इससे अछूता नहीं है। जिला अल्पसंख्यक कल्याण विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक वर्ष 2015-16 में 11 स्थानों पर कब्रिस्तान की चहारदीवारी बनाने का लक्ष्य तय किया गया था।
इसके सापेक्ष सरकार की तरफ से 109.94 लाख रुपया भेजा गया था। इसका जिम्मा सीएनडीएस को दिया गया था। जिला प्रशासन की ओर से 50 फीसदी धनराशि कार्यदायी संस्था को दिया गया था। वह भी खर्च नहीं हो पाया। अभी पिछले साल की 52.46 लाख रुपये की धनराशि शेष बची है।
वर्ष 2016-17 में फिर सरकार की ओर से चहारदीवारी बनवाने के लिए 357.12 लाख रुपये का धन भेजा गया था। तत्कालीन डीएम सूर्यपाल गंगवार ने पिछला ही रुपया खर्च न होने पर इस साल भेजे गए धन को शासन को वापस करा दिया था। जो पांच चहारदीवारी बनाई गई हैं, उनमें भी मानक का ध्यान नहीं दिया गया।
रसूखदार मंत्री के करीबी नेता को मिला था ठेका ः शासन की ओर से जिला अल्पसंख्यक कल्याण विभाग ने कार्यदायी संस्था सीएनडीएस को चहारदीवारी बनाने की जिम्मेदारी सौंपी थी। तत्कालीन सपा सरकार के एक रसूखदार मंत्री ने अपने करीबी नेता को यहां पर चहारदीवारी बनाने का कार्य दे दिया था।
यही वजह रही कि बैरहना कब्रिस्तान में मानक के विपरीत अधूरा निर्माण कार्य हुआ और भुगतान कर दिया गया। कब्रिस्तान की बाउंड्रीवाल न होने से उसकी भूमि पर अगल-बगल प्लाटिंग करने वाले भूमाफिया की निगाहें लगी रहती हैं। तेलियाकोट, मद्दू शहीदन व खपर मलंग के बड़े रकबे पर कब्जा हो चुका है।
तत्कालीन डीएम ने कार्रवाई के लिए लिखा था पत्र ः जिला अल्पसंख्यक कल्याण विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक वर्ष 2015-16 में चहारदीवारी का कार्य सही न होने पर तत्कालीन डीएम सूर्य पाल गंगवार ने कार्रवाई के लिए शासन को बकायदा पत्र भी लिखा था।
बावजूद तत्कालीन डीएम की ओर से लिखे गए पत्र को संज्ञान में नहीं लिया गया। कार्रवाई को छोड़िए, जांच तक नहीं कराई गई। विभाग के अफसर दबी जुबान कहते हैं कि यदि इसकी जांच हुई तो रायबरेली जिले में कब्रिस्तान की चहारदीवारी बनाने के नाम पर घोटाला जरूर सामने आएगा।
कब्जेदारी और बिक्री के सामने आए कई मामले ः शहर में कब्रिस्तानों की भूमि पर पूर्व में कब्जेदारी और बिक्री के कई मामले सामने आए पर लीपापोती कर दी गई। शहर के सबसे बडे़ आवामी कब्रिस्तान मद्दू शहीदन का रकबा वक्फ बोर्ड के दस्तावेज में 54 बीघा दर्ज है, पर वर्तमान समय में उसकी भूमि दर्ज रकबे से कम है। इसी तरह तेलियाकोट कब्रिस्तान के कुछ हिस्से पर कब्जा हुआ। शिया समुदाय अपने कब्रिस्तान की सुरक्षा के लिए बेहद चिंतित हैं, क्योंकि उसके आसपास भी प्लाटिंग हो रही है।