रायबरेली। केंद्र की महत्वाकांक्षी योजना मनरेगा नये वित्तीय वर्ष में भी दम नहीं भर पा रही है। कहीं धन की कमी तो कहीं सहालग व गेहूं की मड़ाई के कारण मनरेगा का काम पूरी तरह से ठप हो गया है। जिले की 700 ग्राम पंचायतों में 391 में काम नहीं चल रहे हैं। जिले में कुछ ढाई लाख जॉबकार्ड धारक हैं, लेकिन वर्तमान समय में मात्र पांच हजार श्रमिक ही काम कर रहे हैं। ग्राम प्रधानों व अधिकारियों के तमाम प्रयासों के बाद भी मनरेगा के कार्य आरंभ नहीं हो पा रहे हैं।
वित्तीय वर्ष 2012-13 में मनरेगा की स्थिति बेहद खराब रही। श्रमिकों को लक्ष्य के सापेक्ष काम नहीं मिल सका। ग्राम पंचायतों में धन न होेने के कारण काम पूरी तरह से प्रभावित रहा। जिन ग्राम पंचायतों में धन उपलब्ध भी था, वहां काम पूरी तरह से ठप रहा। मनरेगा में लक्ष्य के सापेक्ष काम कराने के लिए शासन प्रशासन ने खूब प्रयास किया, लेकिन ग्राम पंचायतों व ब्लॉक स्तरीय अधिकारियों की लापरवाही के कारण काम में तेजी नहीं आ सकी। वित्तीय वर्ष 2013-14 के शुरू होने के बाद भी मनरेगा के कार्यों में तेजी नहीं आ सकी है। गांवों में धन होने के बाद भी काम शुरू नहीं हो सके हैं। हालात यह हैं कि जिले के 700 ग्राम पंचायतों में मात्र 309 में ही काम चल रहे हैं। 391 ग्राम पंचायतों में काम करने के लिए मजदूर तक नहीं मिल रहे हैं। बताते हैं कि मजदूर गेहूं की कटाई व मड़ाई के काम में जुटे हैं। इसकेे अलावा सहालग होने से भी मनरेगा के कार्य और प्रभावित हो गए हैं। प्रधानों का कहना है कि मजदूर न मिलने के कारण ही काम शुरू नहीं हो पा रहे हैं। सहालग व मड़ाई का काम पूरा होने के बाद ही श्रमिक मिल सकेंगे और मनरेगा के काम आरंभ कराए जा सकेंगे।