कृष्ण लीला में दिखते मानव जीवन के स्वभाव व व्यवहार
रायबरेली। श्रीकृष्ण भगवान के लीला चरणों में मानव जीवन के सभी स्वभावों और व्यवहारों का स्पर्श दिखाई देता है। भगवान की शिशु लीला, किशोर लीला या युवावस्था की वैवाहिक आदि लीलाएं समाहित हैं। यह विचार स्वामी सूर्य प्रबोधाश्रम (स्वामी स्वात्मानंद) ने सर्वोदय नगर में चल रहे सतचंडी महायज्ञ एवं श्रीमद्भागवत हृदय नवाह्न परायण कथा के आठवें दिन व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत महापुराण में वैवाहिक जीवन के संबंध में जो भी वर्णन है, उसमें गूढ़ दार्शनिक तत्व सन्निहित है। जो वरा करने योग्य है, वही वर है। वर शब्द श्रेष्ठता का भी वाचक है। महापुराण में वर्णित वर ब्रह्म तत्व है। भगवत भक्तों ने वर को दूल्हा रूप में सजाया है। उन्होंने कहा कि रुक्मिणी ने भगवान कृष्ण को पत्र लिखकर स्वयं को लिवा ले जाने का निवेदन किया था। रुक्मिणी के इस व्यवहार में समाज और मर्यादाओं का अतिक्रमण नहीं है, क्योंकि रुक्मिणी के इस प्रयास को उनके पिता, गुरु, आचार्यों, परिवारीजनों आदि सभी का अनुमोदन प्राप्त था। इस मौके पर प्रशांत बाजपेई, गरिमा बाजपेई, विनय पांडेय, मनोज पांडेय, अवध नरेश पांडेय आदि उपस्थित रहे।