पराक्रम से दुश्मनों के खट्टे कर दिए थे दांत
रायबरेली। सेना के जवानों ने अपने पराक्रम से दुश्मनों के न सिर्फ दांत खट्टे कर दिए थे, बल्कि हर किसी में पाकिस्तान को सबक सिखाने का एक जज्बा था। देश की सीमा पर तैनात जाबांजों के कदम जीत के बाद ही रुक सके। एक बार फिर हम 16 दिसंबर को विजय दिवस मनाने जा रहे हैं। यह दिन हमें उन वीर सपूतों की याद दिलाता है, जो हमारे बीच अब नहीं हैं, लेकिन उनकी शहादत पर इस देश को हमेशा गर्व रहेगा। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र में भी ऐसे वीर सपूत हैं, जिन्होंने 1971 की लड़ाई में दुश्मनों का डटकर मुकाबला किया था और वीरगति को प्राप्त हुए थे। कुछ ऐसे जाबांज हैं, जो आज रिटायर्ड होने के बाद अपने परिवार के साथ जीवन यापन कर रहे हैं। ‘अमर उजाला’ ने कुछ ऐसे ही रिटायर्ड सैनिकों से बात की, जो 1971 की लड़ाई के हिस्सा रहे। उन्होंने अपनी बात को बेबाकी से रखा और उस लड़ाई का जिक्र भी किया।
पाक की जेल से छूटने के बाद लड़ा था युद्ध
शिवगढ़ (रायबरेली)। भवानीगढ़ में जन्मे हरिश्चंद्र सिंह चौहान बताते हैं कि 1965 का भारत-पाकिस्तान का युद्ध लड़ने के बाद छह महीने तक पाकिस्तान जेल में युद्ध बंदी के रूप में रहे। भारत सरकार के पास उनके युद्धबंदी होने का भी कोई प्रमाण नहीं था। इस पर परिवारीजनों समेत सभी ने अनहोनी की आशंका मन में मान ली थी। रेडक्रॉस जब वहां पर सैनिकों को सहायता पहुंचाने गई तो पता चला कि कुछ सैनिकों को पाकिस्तान की सेना कहीं ले गई है। रेडक्रॉस ने गहन जांच की और भारतीय सेना को सूचना दी। करीब 6 माह हरिश्चंद्र सिंह चौहान समेत अन्य सैनिक लौट कर आए तो परिवारीजनों से लेकर ग्रामीणों तक खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसके बाद हरिचंद्र सिंह चौहान ने दूसरी लड़ाई फिर भारत पाकिस्तान के मध्य 1971 में लड़ी और बांग्लादेश का उसी लड़ाई में जन्म हुआ। बताया कि उस समय वह पुंछ सेक्टर में तैनात थे। 1971-72 की लड़ाई लड़ने के बाद 14 फरवरी 1978 में सेवानिवृत्त लेकर पत्नी गिरजावती सिंह व बच्चों के साथ जीवन यापन करने लगे। कहा कि, तीनों बेटे सरकारी सेवा में है। बड़ा बेटा हरकेश सिंह अध्यापक है। दूसरे बेटा हरिबंस सिंह चौहान सेना में और तीसरा बेटा हरिमेश सिंह नवोदय विद्यालय में शिक्षक के पद पर कार्यरत है। परिवार को समेट कर चलने वाले हरिश्चंद्र सिंह चौहान भवानीगढ़ में अपनी एक मिसाल कायम किए हुए कृषि क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। बातचीत में बताया कि हम लोग पीछे नहीं हटते थे। उस समय संसाधन कम थे, लेकिन फिर भी दुश्मनों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था।
पाकिस्तानी सैनिकों के डलवा दिए थे हथियार
शिवगढ़। तरौंजा मजरे कुंभी निवासी एवं रिटायर्ड सैनिक हनुमान प्रसाद मिश्र ने बताया कि उन्होंने 1971 का युद्ध लड़ा था। बताया कि 16 राजपूत रेजिमेंट फतेहगढ़ चार्ली कंपनी में तैनात था। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में दिल्ली सेक्टर से ढाका तक पैदल युद्ध किया और राजशाही बांग्लादेश में सभी पाकिस्तानी सैनिकों को कैद कर हथियार डलवा दिए थे। युद्ध की बात पूछते ही हनुमान प्रसाद का सीना आज भी गर्व से चौड़ा हो जाता है। कहते हैं कि हम लोगों को सिर्फ जीत हासिल करनी थी। संसाधन कम थे। फिर भी पीछे नहीं हटे। आगे ही बढ़ रहे थे। दुश्मनों को हथियार डालने पर मजबूर कर दिया था। जनरल माणिक शाह की अगुवाई में लड़ाई लड़ने वाले हनुमान प्रसाद मिश्रा आज भी योगा गुरु के नाम से जाने जाते हैं। नाथूला पोस्ट करीबगल में 1967 में तीन दिवसीय चाइना युद्ध में भी अपना योगदान दिया। जलपाला पोस्ट लड़कर चीनियों को पीछे कर दिया था और 1981 में सेवानिवृत्त हो गए और उसके बाद वन विभाग में फारेस्ट गार्ड हुए। वहां से भी सेवानिवृत्ति लेकर आज पारिवारिक दायित्व व सामाजिक दायित्व में अपना पूरा सहयोग दे रहें हैं।
ये लड़ते-लड़ते हो गए थे शहीद
जिला सैनिक कल्याण एवं पुर्नवास केंद्र से मिली जानकारी के मुताबिक 1971 की लड़ाई में जिले के सात जवान शहीद हुए थे। इसमें डलमऊ तहसील क्षेत्र के अमरहा पोस्ट दरिगापुर निवासी राम कुमार सिंह, खीरों ब्लॉक क्षेत्र के पाहो निवासी बलवान सिंह, लालगंज ब्लॉक क्षेत्र के बिन्नावां पोस्ट मुरारमऊ के शिव प्रसाद सिंह, गहरौली के रविनारायण सिंह, सर्वोदय नगर के महावीर यादव, सिंहपुर निवासी जमील अहमद, दूरभाष नगर रायबरेली के भगौैती सिंह शामिल हैं।
जाबांजों की शहादत पर हम सबको गर्व : आरके सिंह
जिला सैनिक कल्याण अधिकारी आरके सिंह का कहना है कि 1971 में पाकिस्तान से हुए युद्ध में जिले के सात जवान भी शहीद हुए थे। हम सबको उनकी शहादत पर गर्व है। उनके परिवारीजनों को पेंशन आदि की सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं। 16 दिसंबर को विजय दिवस पर उनके परिवारीजनों को सम्मानित किया जाएगा।