सियायत में कुछ भी तय नहीं होता। समाजवादी पार्टी के भीतर मचे घमासन ने इसे फिर साबित कर दिया है। पार्टी पर वर्चस्व की जंग में जिले के अधिकांश सपाई अखिलेश के पाले में हैं। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के एक आह्वान पर हल्लाबोल और धरतीपुत्र का नारा लगाने वालों ने मौके की नजाकत को भांपते हुए उन्हीं से दूरी बना ली। चाचा-भतीजे की लड़ाई के बीच जिले के सपाई अखिलेश को सह ठहरा रहे हैं। प्रत्याशी उनके ही नेतृत्व में चुनाव में जाना चाहते हैं तो ज्यादातर कार्यकर्ता भी उनके ही पक्ष में हैं। कुछ पुरनिए जो अब भी मुलायम के कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं, उन्हें संगठन में तरजीह नहीं दी जा रही है। उन्हें एकदम से हाशिए पर डाल दिया गया है।
शनिवार को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और रामगोपाल यादव का निलंबन वापस लेने के बाद लगा कि सपा में लंबे समय से चल रहा घमासाना अब थम जाएगा, लेकिन रविवार को लखनऊ में हुए अधिवेशन में अखिलेश यादव को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने और शिवपाल को प्रदेश अध्यक्ष से हटाने के बाद कलह फिर बढ़ गई है। इसके तुरंत बाद मुलायम के फिर से छह साल के लिए रामगोपाल को सपा से बाहर करने के बाद सियासत गरम है। बेल्हा में भी इसका असर साफ दिख रहा है। अधिवेशन के बाद जिले के अधिकांश नेता और कार्यकर्ता मुख्यमंत्री के पक्ष में खड़े नजर आ रहे हैं। कभी मुलायम के बेहद करीबी माने जाने वाले लोगों ने भी उनसे किनारा कस लिया है। यही वजह है कि शिवपाल की कार्रवाई की चेतावनी के बाद भी जिले से बड़ी संख्या में कार्यकर्ता और नेता अधिवेशन में शामिल हुए। अब देखने वाली बात यह होगी कि 5 जनवरी को सपा सुप्रीमो की तरफ से बुलाए गए अधिवेशन में जिले के दिग्गज नेता और कार्यकर्ता क्या निर्णय लेते हैं।
इसके बाद से तो तस्वीर एकदम साफ हो जाएगी। सदर विधायक नागेंद्र सिंह यादव, पट्टी विधायक रामसिंह, रानीगंज विधायक व मंत्री शिवाकांत ओझा, विशभनाथगंज से घोषित प्रत्याशी संजय पांडेय के अलावा सपा के कई अन्य कद्दावर नेता अखिलेश के समर्थन में एकजुट हैं। हालांकि इसके साथ वह यह भी जोड़ते हैं कि मुलायम सिंह उनके सर्वमान्य नेता हैं। वहीं सपा में मचे घमासान के बीच मुलायम सिंह के कंधे से ंकंधे मिलाकर खड़े होने और उनके हर निर्णय को स्वीकार करने वाले सपाई पार्टी में ही हाशिए पर चले गए हैं। संगठन के भीतर भी उनकी बातों को विशेष तवज्जो नहीं दी जा रही है। पूर्व जिलाध्यक्ष भइयाराम पटेल समेत कई ऐसे सपाई हैं जिन्हें मुलायम का बेहद करीबी माना जाता है, लेकिन मौजूद समय में वे खुद पार्टी में हाशिए पर चले गए हैं।
अब किस करवट बैठेगी राजाभैया की सियासत
प्रतापगढ़(ब्यूरो)। सपा में मची कलह के बीच सियायत के गलियारों में राजभैया को लेकर भी चर्चा है। राजाभैया को मुलायम का बेहद करीबी माना जाता है, लेकिन बीच में जब तब उनकी मुख्यमंत्री अखिलेश ने बैठने की खबरें भी उड़ती रहीं। हालांकि राजाभैया हमेशा इसे गलत बताते रहे। कुछ महीनों पहले सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के साथ खुद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव राजाभैया से मिलने लखनऊ स्थित उनके आवास पहुंचे थे। माना जा रहा था कि इसके बाद सीएम और राजाभैया के बीच की तल्खी खत्म हो गई थी, लेकिन अब सपा में छिड़े घमासान के बीच फिर यह चर्चा तेज हो गई है कि राजाभैया की सियासत किस करवट बैठेगी।
सपा में लगातार बन व बिगड़ रहे हालात पर राजाभैया की भी नजर है। उनको लेकर जब तब अफवाहों का बाजार गर्म होता रहा है। कभी मुख्यमंत्री से मंत्रीमंडल को लेकर मतभेद की अफवाहों को तूल देने का प्रयास किया गया तो कभी सीएम से न बनने को लेकर। हालांकि राजाभैया ऐसी बातों को हमेशा निराधार ठहराया। यहां यह बताना जरूरी है कि बसपा शासन में ढेर सारे मुकदमों के बाद राजाभैया व उनके पिता राजा उदयप्रताप सिंह पर पोटा लगा दिया गया था। उस समय राजाभैया का मुलायम सिंह ने खुलकर साथ दिया था। बसपा के सत्ता से हटने के बाद सपा सत्ता में आई तो सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने पोटा हटाने का ऐलान किया था। इस बात का जिक्र हमेशा राजा भैया करते हैं। पीआरओ ज्ञानेंद्र सिंह ने बताया कि राजाभैया ने हमेशा सपा का सर्वमान्य नेता मुलायम सिंह यादव को माना है और हमेशा मानते रहेंगे। उनका समर्थन सपा को हैं और जारी रहेगा। मुख्यमंत्री के तौर अखिलेश यादव उनकी पंसद हैं। पार्टी के अंदरूनी मामलों से उनका कोई लेना-देना नही है।