ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों के बीच खूबसूरत वादियां थीं। मासूमियत थी, कश्मीरियत थी। जिंदगी बर्फ से लकदक पहाड़ों की तरह खिली थी, लेकिन इसके आगे बहुत बड़ा इम्तहान था। दस साल तक जिसे मसीहा बनाकर पूजा वह भी घाटी के पत्थरों का बना था। कुंठा थी, निराशा थी, बेबसी थी, लाचारी थी पर, इनके बीच उम्मीदों का आसमान था। वह न टूटी, न रुकी। गोद में छह साल का बेटा था और पास में पुश्तैनी धंधे के कुछ गर्म कपड़े। जम्मू-कश्मीर के छोेटे से कस्बे अनंतनाग से अपने 34 साल की यादें और पूरी दुनिया समेटकर परवीन प्रतापगढ़ पहुंची तो फौलाद बन गई, मगर मुसीबतों ने यहां भी उसका पीछा नहीं छोड़ा। नोटबंदी के कारण गर्म कपड़ों का धंधा चौपट हो गया। सामने मुसीबतों का पहाड़ था। न कोई अपना था न कोई सहारा देने वाला। उसके अंदर जिद थी। चुनौतियों से टकराने का जज्बा था। आग थी, मुसीबतों को जला देने की। चिंता थी बच्चे के भविष्य की। जैसे-तैसे कपड़ों के साथ पास में रहे जेवर बेचे और ई-रिक्शा खरीदकर चलाने लगी। अब वह हर रोज जूझती है। कभी किराये को लेकर सवारियों से तो कभी शोहदों से, लेकिन जिंदगी की जंग जारी है।
जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग की रहने वाली परवीन गनी की शादी 2004 में वहीं के आजाद गनी के साथ हुई थी। छह साल बाद उसे एक बेटा हुआ और जिंदगी आराम से चल रही थी। 2014 में परवीन पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। एक हादसे में उसके माता-पिता की मौत हो गई। एक साल पहले पति आजाद गनी ने भी उसका साथ छोड़ दिया और दूसरी शादी कर ली। कश्मीर में हालात खराब थे और परवीन गोद में छह साल के बेटे को लेकर भटक रही थी। पता नहीं उसे क्या सूझा और जुलाई के आखिरी दिनों में वह पुुश्तैनी गर्म कपड़ों का गट्ठर समेटकर बेटे को लेकर प्रतापगढ़ पहुंच गई। शहर से सटे जोगापुर में किसी तरह उसे किराये का कमरा मिला। करीब चार महीने तक वह जैसे-तैसे कपड़े बेचकर गुजारा करती रही, लेकिन नोटबंदी के चलते उसकी कमर टूट गई। खाने का भी संकट खड़ा हो गया। मुसीबतों से घिरी परवीन ने फिर ऐसा कदम उठाया जिससे वह समाज के लिए आईना बन गई। जैसे-तैसे औने-पौने दाम पर सारे कपड़े बेच दिए। इसके बाद भी रुपये कम पड़े तो शरीर के सारे गहने बेचे और एक लाख 22 हजार रुपये का इंतजाम कर ई-रिक्शा खरीदा। अब वह शहर की पहली महिला ई-रिक्शा चालक है।