नई पीढ़ी की नई सोच और नई तरह की जीवनशैली ने कई परिवारों को दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है। ससुराल की बंदिशें नवविवाहिताओं को रास नहीं आ रही हैं। घर की चहारदीवारी के अंदर चौबीस घंटे घूंघट में रहने की मजबूरी उन्हें स्वीकार नहीं है। ससुराल में खाने बनाने और दिनभर काम के बजाए मायके का आराम उन्हें ज्यादा रास आ रहा है। या तो वह बाहर नौकरी करने वाले पति के साथ रहना चाहती हैं या फिर मायके में। इस जिद का नतीजा है कि कई शादियां टूटने के कगार पर पहुंच गई हैं। कुछ ऐसे भी मामले हैं जिनमें नवविवाहिताओं ने अपने पति के खिलाफ ही तहरीर दे दी है। महिला सहायता प्रकोष्ठ में इस साल जनवरी से अब तक इस तरह के करीब 255 मामले सामने आ चुके हैं।
पति और ससुराल में होने वाले झगड़ों को लेकर पुलिस को तहरीर देने वाली महिलाओं के ज्यादातर मामलों को पहले महिला सहायता प्रकोष्ठ भेज दिया जाता है। पहले दोनों पक्षों को समझाकर फिर से एक साथ रहने के लिए राजी करने का प्रयास किया जाता है।
जब बात नहीं बनती है कि केस दर्ज कर विवेचना शुरू की जाती है। जनवरी से अब तक के आंकड़ों पर नजर डालें तो जिले के विभिन्न क्षेत्रों से करीब 255 मामले महिला सहायता प्रकोष्ठ में पहुंचे हैं। इनमें कुछ मामले दहेज उत्पीड़न को लेकर भी हैं। महिला सहायता प्रकोष्ठ की प्रभारी दुर्गावती के मुताबिक बातचीत करने के बाद यह निकलकर सामने आया है कि कुछ मामलों में लड़कियां खुद ससुराल जाने के लिए राजी नहीं हैं। कुछ ऐसे भी मामले हैं जिनमें नवविवाहिताओं का सास के साथ सामंजस्य कम बैठ रहा है। कुछ युवतियां सिर्फ इसलिए खफा हैं कि उन्हें भी बाहर परदेस में रह रहे पति के साथ रहना है। ससुराल की रसोई और सास की फटकार उन्हें कत्तई बर्दाश्त नहीं है। कई ऐसे भी मामले हैं कि जिनमें युवतियों ने साफ कह दिया है कि वह ससुराल तभी जाएंगी जब पति उन्हें अकेले लेकर रहेंगे। इन छोटी-छोटी बातों को लेकर भी उन्होंने पति के खिलाफ ही पुलिस को तहरीर दे दी है। महिला सहायता प्रकोष्ठ में मामला पहुंचने के बाद ऐसे लोगों की काउंसलिंग कर उन्हें समझाने का प्रयास किया जा रहा है। ताकि फिर से उनकी आबाद जिंदगी को बर्बाद होने से बचाया जा सके।