आमतौर पर सामाजिक रीति-रिवाज के अनुसार शादी के बाद बेटियां विदा होकर बहु के रूप में ससुराल आती हैं। मगर रविवार को दीवानी न्यायालय परिसर में आयोजित राष्ट्रीय लोकअदालत में एक ऐसे अनोखे दंपती का विवाह कराया गया, जिसमें समाज की इस रीति को दरकिनार कर पति अपनी पत्नी के मायके में जाकर रहने को तैयार हुआ। प्रधान न्यायाधीश सुरेश चंद्र आर्या ने दोनों दंपतियों के बीच के विवाद को समाप्त कराकर सुलह कराई। अदालत के समक्ष दोनों ने एक-दूसरे को वरमाला पहनाई और साथ रहने को राजी हुए। माता-पिता के अलगाव से लेकर दोबारा साथ रहने तक की यात्रा के बच्चे गवाह बने।
रखहा निवासी राजबहादुर पटेल साइकिल बनाने का काम करते हैं। इनकी शादी पट्टी के सदहीपुर की अमरावती से वर्ष 2000 में हुई थी। दोनों के सत्यम और शुभम नाम के दो बेटे हैं। अमरावती अपने मायके में अकेली संतान हैं। उनके माता-पिता की मृत्यु के बाद गांव का घर और खेती उनके नाम आ गई और साथ में उसे संभालने की जिम्मेदारी भी। इधर ससुराल में माली हालत कमजोर होने पर अमरावती ने पति राजबहादुर से बच्चों को साथ लेकर मायके सहदीपुर चलकर रहने को कहा। जिस पर दोनों में मतभेद हो गया और 2016 से दोनों अलग हो गए। पति से अलग होकर अमरावती दोनों बेटों को साथ लेकर मायके में रहने लगीं। इसके बाद से दोनों का मामला परिवार न्यायालय में विचाराधीन चल रहा था। रविवार को लोक अदालत में प्रधान न्यायाधीश सुरेश चंद्र आर्या ने दोनों को साथ रहने को तैयार किया। यह तय हुआ कि दोनों थोड़े-थोड़े समय के लिए दोनों जगह रहेंगे। शुरुआत राजबहादुर की ओर से हुई और वह ससुराल रहने जाने को तैयार हो गए। न्यायालय में दोनों ने एक-दूसरे को माला पहनाकर नई पारी की साझा शुरुआत की। साथ में बड़ा बेटा सत्यम भी मौजूद रहा।