फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

रोजेदार के लिए दुआ का पेड़ है रोजा

Thu, 16 Jun 2016 12:06 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो प्रतापगढ़
विज्ञापन
विज्ञापन
दुनिया के हर मज़हब में अपने-अपने मजहबी तरीके से लोग उपवास (रोजा) रखते हैं। हर शख़्स अपने-अपने मजहब की मान्यताओं के तहत उपवास के कायदे-कानून का पालन करता है। सब मजहबों ने उपवास (रोजा) का तशबीहात (उपमाओं) से जिक्र किया है। मिसाल के तौर पर जैन धर्म में पर्युषण पर्व के उपवास आत्मशुद्धि और कषाय-मुक्ति का पर्व है। इसी तरह इस्लाम में रोजेदार के लिए रोजा दुआ का पेड़ है। सनातन धर्म के मानने वालों में नवरात्रि के उपवास मातृशक्ति और भक्ति के प्रतीक हैं। यानी हर धर्म में उपवास को विशिष्ट दृष्टि से देखा गया है। इस नजरिए से जो जिस धर्म का मानने वाला है, उसको अपने धर्म के मुताबिक चलने और उसका पालन करने में इस्लाम को कोई गुरेज नहीं है। हकीकत तो यह है कि पवित्र कुरआन के तीसवें पारा (अध्याय-30) की सूरे-काफेरून की आखिरी आयत में जिक्र है तुम अपने दीन पर रहो मैं अपने दीन पर चलूं। चूंकि इस्लाम मजहब एकेश्वरवाद (ला इलाहा इल्लल्लाह) को मानता है और हजरत मोहम्मद को अल्लाह का रसूल (मोहम्मदुर्र रसूलल्लाह) स्वीकारता है, इसलिए रोजा मुसलमान पर फर्ज की शक्ल में तो है ही, अल्लाह की इबादत का एक तरीका भी है और सलीका भी। तक्वा (पुण्य कर्म और साधनों की शुद्धता) तरीका है रोजा रखने का। सदाकत (सत्य-निष्ठा) सलीका है रोजे की पाकीजगी का। रमजान में रोजेदार के लिए सब्र सड़क जैसी है और जकात (दान) पुल है। ऐसा पाकीजा रोजा रोजेदार के लिए दुआ का दरख़्त है।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें