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महात्मा गांधी से मिलकर राजाराम किसान ने फूंका अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल

Fri, 10 Aug 2018 11:48 PM IST
प्रतापगढ़ ब्यूरो
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देश की आजादी में जिले के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियाें का जिक्र पंडित राजाराम किसान का नाम जोड़े बिना पूरा नहीं हो सकता। राजाराम ने वर्धा में महात्मा गांधी से मिलने के बाद अंग्रेजों के खिलाफ देश की आजादी का बिगुल फूंका था। अंग्रेजाें को चुनौती देते हुए नमक सत्याग्रह और लगान बंदी आंदोलन की अगुवाई करने पर उन्हें जेल में ठूंस दिया गया। भारत छोड़ो आंदोलन में जिले के आजादी के दीवानाें का नेतृत्व करने पर नौ महीने काल कोठरी में गुजारनी पड़ी। अंग्रेजों के लाख जुल्म-ओ-सितम सहने और कई बार जेल जाने के बाद भी वह टूूटे नहीं और लोगों में आजादी की अलख जगाए रखी। आजादी की लड़ाई में उनके योगदान को देखते हुए पंडित जवाहरलाल नेहरू उनसे मिलने सांगीपुर आए थे।
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जिले के सांगीपुर इलाके में स्थित छोटे से गांव देऊम पूरब में आठ नवंबर सन 1909 में पंडित राजाराम किसान का जन्म हुआ था। तब किसी ने यह नहीं सोचा था कि आगे चलकर यह बालक जिले में आजादी के आंदोलन की अगुवाई करेगा। 12 वर्ष की उम्र में ही इनके पिता सूर्यबली शुक्ल का निधन हो गया। इसके बाद परिवार की जिम्मेदारी इनके कंधे पर आ गई। लेकिन आजादी के  इस योद्धा का मन परिवार की देखरेख से अधिक अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन में अधिक लगने लगा। वह सरोजनी नायडू से बहुत प्रभावित थे। 1927 में वह पैदल ही सरोजनी नायडू से मिलने इलाहाबाद चल दिए। वहां मुलाकात के बाद सरोजनी का भाषण सुनने वाराणसी चले गए। उनके भाषण से वह इतने प्रभावित हुए कि उसी दिन आजादी की जंग लड़ने की ठान ली। इसके बाद किसान महाराष्ट्र के वर्धा जिले में महात्मा गांधी के आश्रम जाकर उनसे मुलाकात की। इसके बाद जब वह घर लौटे तो अंग्रेजाें के खिलाफ घूम-घूम कर लोगाें को आंदोलन के लिए प्रेरित करना शुरू किया। इसकी जानकारी होने पर वह अंग्रेजाें की आंखाें की किरकिरी बन गए। नमक के उत्पादन व वितरण में अंग्रेजाें का एकाधिकार खत्म करने के लिए गांधीजी ने जब नमक सत्याग्रह शुरू किया तो उनसे प्रेरणा लेकर राजाराम किसान ने सांगीपुर के रेहुआ लालगंज में नमक बनाना शुरू कर दिया। इसकी जानकारी होते ही अंग्रेजाें ने उन्हें जेल में ठूंस दिया। रायबरेली जेल से तीन महीने बाद जब वह जेल से रिहा हुए तो अंग्रेजाें के खिलाफ उन्होंने दोबारा आंदोलन शुरू कर दिया। इस समय अंग्रेजाें को लगान देने का विरोध शुरू हो गया था। जिले में उन्होंने आजादी के दीवानाें के साथ मिलकर लगान बंदी के आंदोलन शुरू कर दिया। इस पर राजाराम को एक बार फिर से जेल जाना पड़ा। 1931 से 1939 तक वह आजादी की लड़ाई लड़ने के चलते कई बार जेल गए। जेल में रहने के दौरान अंग्रेजाें के कहने पर तालुकेदाराें ने उनका घर फूंक दिया। मवेशियाें को जीवित ही कुएं में डाल दिया। जब वह जेल से छूटकर बाहर आए तो अंग्रेजाें भारत छोड़ा आंदोलन जोर पकड़ चुका था। उन्होंने अंग्रेजों के जुल्म-ओ-सितम के आगे झुकने के बजाए एक बार फिर भारत छोड़ो आंदोलन की कमान संभाल ली। सन 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन की अगुवाई करने के चलते एक बार फिर उन्हें जेल की काल कोठरी में जाना पड़ा। नौ महीने तक उनको काल कोठरी में रखा गया। इस दौरान चौबीस घंटे के भीतर उनको सिर्फ एक बार खाना पानी मिलता था। जब वह रिहा हुए तो फिर आजादी का नारा बुलंद किया। इस दौरान पंडित जवाहरलाल नेहरू उनसे मिलने सांगीपुर आए। इसके बाद राजाराम ने अंग्रेजाें के खिलाफ आजादी की लड़ाई और तेज कर दी। आखिरकार 1947 में देश आजाद हुआ। इसके बाद राजाराम किसान रामपुर खास के पहले विधायक चुने गए। समाजसेवा के क्षेत्र में जीवन भर वह योगदान करते हुए 2013 में एक सौ चार वर्ष की उम्र में गोलोकवासी हुए।
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