कभी बाढ़ से कहर बरपाने वाली बकुलाही नदी अब खुद पानी के लिए तरस रही है। बिहार ब्लाक के कमासिन श्रृंगारपुर से मानधाता ब्लाक के ढेमा गांव तक नदी पूरी तरह से सूख गई है। पानी के बजाए नदी में जगह-जगह मिट्टी के टीले और जंगली सरपत ही नजर आ रहे हैं। वर्षों पहले नदी में की गई लूप कटिंग का नतीजा यह हुआ कि जलस्तर धीरे-धीरे खिसकता चला गया। इसका खामियाजा नदी के किनारे बसे गांवों को भी भुगतना पड़ रहा है। कई गांवों में भूगर्भ जलस्तर बेहद नीचे चला गया है। यहां लोग हैंडपंप लगाकर भी पानी नहीं ले पा रहे हैं।
रायबरेली जनपद के सलोन तहसील के पाकसरांवा गांव स्थित मझियर झील से निकली बकुलाही नदी का इतिहास काफी पुराना है। रामायण और महाभारत में भी इसका जिक्र किया गया है। प्राचीन काल में इसका नाम बालकुनी था। संग्रामगढ़ ब्लाक के ककरिहा गांव से यह नदी जिले में प्रवेश करती है। संग्रामगढ़ के बकोल ताल से होते हुए यह बिहार ब्लाक में प्रवेश करती है। बताते हैं कि इसके कारण ही बाद में इसका नाम बकुलाही पड़ गया। जिले में करीब 158 किमी की दूरी तय करने के बाद प्रतापगढ़ शहर के पास स्थित खजुरनी गांव में सई नदी में मिल जाती है। नदी के किनारे दर्जनों गांव स्थित हैं। बताते हैं कि पहले नदी में बाढ़ आने के कारण किनारे बसे गांवों में पानी घुस जाता है। इससे लोगों को भारी परेशानी झेलनी पड़ती थी।
करीब तीस साल पहले भयहरणनाथ धाम के पास लूट कटिंग कर इसकी धारा को सीधा कर दिया गया। दरअसल यहां नदी करीब बीस किमी तक अंग्रेजी के एस के आकार में घूमी हुई थी। इससे इसके किनारे पर स्थित सरायभूपति, पूरेतोरई, बाबूपुर, सरायदेवराय, छतौना, मनेहू, हैंसी, धर्मपुर, शिवरा समेत दर्जनों बाढ़ की चपेट में आ जाते थे। लोगों की परेशानी को देखते हुए तत्कालीन सांसद और विदेश मंत्री राज दिनेश ने लूट कटिंग कराकर नदी की धारा को सीधा करवा दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि नदी का जलस्तर तेजी से गिरता चला गया। धीरे-धीरे हालत यह हो गई कि खुद नदी पानी के लिए तरसने लगी है। इसके किनारे पर स्थित गांवों में पानी का गंभीर संकट खड़ा हो गया। आसपास के तालाब भी सूख गए। अब नदी में पानी की जगह मिट्टी के टीले और सरपत है। कहीं-कहीं कुंड आदि होने के कारण हल्का पानी है। सदर तहसील के मानधाता ब्लाक के हरिहरपुर, सराय गोविंद राय, भवलपुर, सहेरूआ, कुशफरा चन्हईपुर, मदईपुर, सहिजनपुर, संसारपुर, शेखनपुर आदि गांवों के लोग कभी पंपिंगसेट लगाकर नदी से सिंचाई करते थे। लेकिन अब पीने के पानी का भी संकट खड़ा हो गया है। नदी का अस्तित्व धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है।