सदर विधानसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में समाजवादी पार्टी कहीं भी सीधे मुकाबले में नजर नहीं आई। पार्टी भले ही दूसरे नंबर पर रही, लेकिन उसे यहां तक आने के लिए भी संघर्ष करना पड़ा। सपा उम्मीदवार बृजेश वर्मा वोटों के लिहाज से संघर्ष करते नजर आए। एआईएमआईएम के पक्ष में मुस्लिम मतों का धु्रवीकरण होने के चलते सपा पूरी तरह से हाशिए पर चली गई। अब तक हर चुनाव में सपा के साथ रहने वाले मुसलमानों ने उससे पूरी तरह दूरी बना ली। जिससे चलते सपा को 2017 में हुए विधानसभा में मिले मतों के मुकाबले आधे पर संतोष करना पड़ा।
माना जा रहा है कि पटेल वोटरों के बंटने के कारण भी सपा को नुकसान हुआ है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के चुनाव प्रचार में न आने और पार्टी नेताओं में गुटबाजी के चलते भी पार्टी के जनाधार में कमी आई है।
2012 के विधानसभा चुनाव में प्रतापगढ़ सदर विधानसभा सीट से नागेंद्र यादव मुन्ना विधायक चुने गए थे। उन्हें कुल 43754 वोट मिले थे। बसपा से उन्हें तगड़ी टक्कर दी थी। इस चुनाव में भाजपा और अपना दल ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था। भाजपा को तीसरा और अपना दल को चौथा स्थान मिला था। कांग्रेस पांचवें स्थान पर रही थी। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा लहर में सपा को 2012 के मुकाबले ज्यादा वोट मिले थे, लेकिन भाजपा-अपना दल एस गठबंधन के प्रत्याशी के पक्ष में लोगों ने जमकर मतदान किया। अद एस से मैदान में उतरे संगमलाल गुप्ता 80828 वोट मिले थे। सपा 46274 मतों के साथ दूसरे स्थान पर रही थी। उपचुनाव में भी सपा दूसरे नंबर पर काबिज है, लेकिन उसका वोट प्रतिशत खिसक गया है।
पटेल बहुल सीट पर उसका स्वजातीय प्रत्याशी उतारने का दांव भी काम नहीं आया। सपा को मिले वोटों का विश्लेषण करने के बाद राजनीति के जानकार मान रहे हैं कि उसे मुस्लिमों के साथ पटेलों का भी पूरी तरह साथ नहंी मिला। यही कारण रहा कि पार्टी को 23228 मतों से संतोष करना पड़ा। मतगणना के शुरुआती दौर में सपा दूसरे स्थान के लिए भी संघर्ष करती नजर आई। 18 राउंड तक लगातार कांग्रेस ने दूसरे स्थान पर कब्जा कर रखा था।
पैराशूट प्रत्याशी और सामंजस्य की कमी से बसपा का बंटाधार
प्रतापगढ़। प्रतापगढ़ सदर विधानसभा सीट पर कुर्मी मतों की अहमियत को देखते हुए बसपा ने भी उपचुनाव में पटेल बिरादरी के प्रत्याशी पर ही दांव खेला था। उसकी रणनीति सपा के साथ भाजपा-अद गठबंधन को काटने की थी, लेकिन पैराशूट प्रत्याशी और मतदाताओं के बीच सामंजस्य स्थापित न करने के कारण पार्टी पांचवें नंबर पर चली गई। उसे कांग्रेस और एआईएमआईएम से भी कम मतों से संतोष करना पड़ा।
2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने सपा को कड़ी टक्कर दी थी। बसपा के नागेंद्र यादव मुन्ना के 43754 वोटों के मुकाबले बसपा प्रत्याशी संजय त्रिपाठी 36244 मत पाकर दूसरे स्थान पर रहे थे। 2017 के विधानसभा चुनाव में भी बसपा को 41750 वोट मिले थे। हालांकि उसे तीसरे स्थान पर खिसकना पड़ा था। सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय का नारा देने वाली बसपा उपचुनाव में अपने कैडर वोटों को भी नहीं सहेज सकी। जौनपुर जिले के रणजीत पटेल को प्रत्याशी बनाना भी पार्टी के लिए भारी पड़ा।
प्रचार की शुरुआत से ही उन पर बाहरी होने का ठप्पा लग गया। यही कारण है कि पटेल बिरादरी का प्रत्याशी उतारने के बाद भी पार्टी मतदाताओं से सामंजस्य नहीं स्थापित कर सकी। बाहरी होने के कारण रणजीत पटेल कैडर वोट पर भी अपना प्रभाव नहीं छोड़ सके। उन्हें मुसलमानों के साथ पिछड़ी और अगड़ी जातियों के भी वोट नहीं मिले। जिसके चलते बसपा पांचवें नंबर पर खिसक गई। उसे पहले के चुनावों में फिसड्डी रहने वाली कांग्रेस और पहली बार चुनाव मैदान में उतरी एआईएमआईएम से भी कम वोट मिले। पार्टी की करारी हार के लिए स्थानीय नेता भी कम जिम्मेदार नहीं रहे। वह सिर्फ नाम के लिए ही प्रत्याशी के साथ लगे रहे।
आई और छा गई एआईएमआईएम
-कई राजनैतिक दलों की बढ़ी चिंता, पूरी तरह छिटक गए मुस्लिम मतदाता
प्रतापगढ़। पहली बार चुनाव मैदान में उतरी एआईएमआईएम ने अपने प्रदर्शन से लोगों को चौंका दिया है। पार्टी के प्रत्याशी इसरार अहमद को बीस हजार से भी अधिक वोट मिले हैं। तीसरे नंबर पर रहने वाली एआईएमआईएम कुछ ही मतों से सपा से पीछे रह गई। उसने न सिर्फ अपनी उपस्थिति दर्ज कराई बल्कि, सपा, बसपा और कांग्रेस का खेल पूरी तरह से खराब कर दिया।
सदर विधानसभा के उपचुनाव में सपा व कांग्रेस से मुस्लिम मतदाता पूरी तरह छिटक गए। एआईएमआईएम का मुस्लिम मतदाताओं ने खुलकर साथ दिया। जिले में पार्टी का कोई भी राजनीतिक वजूद नहीं था। इसके बावजूद उपचुनाव में उसने शानदार सफलता हासिल की है। आईएमआईएम प्रत्याशी को बसपा व कांग्रेस प्रत्याशी से अधिक मत मिले हैं। एआईएमआईएम के जिला अध्यक्ष रहे इसरार अहमद के संघर्षों को देखते हुए पार्टी नेतृत्व ने उपचुनाव में उन्हें प्रत्याशी बनाया। लोकसभा चुनाव के पहले ही एआईएमआईएम ने माइनारटीज वेलफेयर सोसायटी के नगर अध्यक्ष इसरार अहमद को जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी थी। वह मुस्लिमों के छोटे-छोटे मामलों को लेकर सड़क से लेकर अफसरों के कार्यालयों तक आवाज बुलंद करने के साथ ही संघर्ष करते रहे हैं। टेऊंगा का राबिया हत्याकांड हो या फिर मुस्लिम समाज के युवकों को फर्जी तरीके से मुकदमों में फंसाने और पकड़कर पूछताछ के नाम पर कोतवाली व थानों में रखने का मामला, वह हमेशा आवाज उठाते रहे। उपचुनाव के दौरान उन पर आदर्श आचार संहिता उल्लंघन के कई मुकदमे दर्ज हुए। जिसे वह मुस्लिमों के बीच भुनाने में कामयाब रहे। गुरुवार को विधानसभा उपचुनाव का परिणाम आया तो एआईएमआईएम का नाम राजनैतिक दलों के बीच चर्चा का विषय बन गया। प्रत्याशी इसरार अहमद ने अपने संघर्ष के बूते बसपा व कांग्रेस को पीछे छोड़ते हुए तीसरा स्थान प्राप्त किया। पहली बार चुनाव मैदान में उतरी एआईएमआईएम ने अपने प्रदर्शन से सभी दलों को सोचने के लिए मजबूर कर दिया।
सपा प्रत्याशी बृजेश वर्मा।- फोटो : PRATAPGARH
बसपा प्रत्याशी रणजीत सिंह पटेल।- फोटो : PRATAPGARH
एआईएमआईएम प्रत्याशी इशरार अहमद।- फोटो : PRATAPGARH