नाक की एलर्जी की अनदेखी लोगों के लिए भारी पड़ रही है। जरा सी लापरवाही पर लोग अस्थमा (सांस फूलने) जैसी बीमारी की गिरफ्त में आ रहे हैं। हर रोज इस तरह के करीब 30 से 35 मरीजों का उपचार जिला अस्पताल में ही हो रहा है। इसके अलावा निजी अस्पतालों में भी ऐसे मरीज बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं। डॉक्टरों की मानें तो धूल से सने शहर और बदला मौसम भी इस बीमारी की बड़ी वजह हैं। अचानक बढ़े रोगियों की तादाद देख डॉक्टर खुद अचंभित हैं।
शहर में धूल के गुबार से लोगों का जीना दुश्वार है। अब तो मौसम का भी मिजाज दिनोंदिन बदल रहा है। रात में अधिक सर्दी तो सुबह करीब नौ बजे तक लोगों को ठंड का एहसास होता रहता है। डॉक्टर कहते हैं कि इस मौसम में निष्क्रिय वायरस भी सक्रिय हो जाते हैं। सर्दी व गर्मी के मौसम में धूल और पराग कण ऊपर की ओर नहीं जा पाते। सांस केजरिए वह कण नाक में प्रवेश कर जाते हैं। चूंकि नाक की नली का जुड़ाव सीधे फेफड़े से होता है। जिससे अस्थमा रोग पैदा करने वाले कण फेफड़े में बैठ जाते हैं।
यह बीमारी की प्रथम स्थिति है। कभी-कभी शरीर किसी पदार्थ या तत्व को भी ऐसे मौसम में स्वीकार नहीं करता। यह दशा भी एलर्जी की श्रेणी में आती है। इन स्थितियों को मेडिकल भाषा में ‘हायर सेंसिटीविटी’ कहा जाता है। जबकि सामान्य भाषा में इस हालात को एलर्जी माना जाता है। इस तरह केरोग से पीड़ित प्रतिदिन दर्जनों की संख्या में इलाज के लिए अस्पताल पहुंच रहे हैं।