मनरेगा मजदूरों को काम देने की गारंटी देती है। योजना थी कि मजदूरों को गांव में ही काम मिलेगा और शहरों को होने वाले पलायन रुकेंगे। यह योजना तो तेजी से चल रही है, लेकिन मजदूरों का फायदा इसमें नाममात्र का ही है। कारण है मजदूरों का जाबकार्ड तो बना है लेकिन उन्हें पूरी मजदूरी नहीं मिल पाती। काम जेसीबी से होता है और उनके खाते में पैसा आने पर प्रधान, ठेकेदार या फिर अन्य विभाग के लोग उन्हें 2-3 सौ रुपये पकड़ाकर पूरा पैसा निकलवा लेते हैं।
विकास खंड कुंडा के सुजौली, दिलेरगंज, बलीपुर में इतना अधिक काम हुआ है कि लगता है कि पूरा गांव ही नाली खड़ंजा, चकरोड से भर गया होगा, लेकिन हकीकत में मजदूरों का पता ही नहीं है कि उन्होंने काम कहां किया। मनरेगा में काम तो खूब हो रहा है लेकिन मजदूरों का फायदा नहीं। लाखों रुपये का काम इसी वित्तीय वर्ष में हो चुका है। नाले, तालाब खुद गए हैं। चकरोड बन गया है। रजिस्टर पर सैकड़ों की संख्या में मजदूर काम करते दिख रहे हैं लेकिन गांव में मजदूर दिखते नहीं। किसी एक गांव में जाबकार्ड के लिए दर्ज मजदूर से पूछा जाए कि वह कितने दिन तक काम कर चुका है तो वह शायद ही बता पाए। यही नहीं उसके पास जाबकार्ड भी नहीं मिलेगा।
बावजूद इसके उसके जाबकार्ड पर पूरी पेमेंट रजिस्टरों पर निकली मिलेगी। उसके खाते से पैसा भी निकला होगा लेकिन उसे मिला क्या सिर्फ पैसा निकालकर देने की एक दिन की मजदूरी। यह खेल कुंडा के कई गांवों में चल रहा है। जाबकार्ड नए भी बन रहे हैं।फिलहाल इस बारे में अधिकारी भी कुछ बोलने से कतराते हैं। बीडीओ रमाशंकर सिंह का कहना है कि काम चल रहा है। पेमेंट भी मजदूरों के खाते में हो रहा है। ऐसे में दूसरा पैसा निकाल रहा है तो वह कुछ नहीं कर सकते।