सफर के दौरान ट्रेन में बीमार मरीज का इलाज करने गए रेलवे अस्पताल के स्टाफ ने दो सौ रुपये वसूल लिए। उसका ठीक से इलाज भी नहीं किया। दवाएं भी सस्ती दी। यात्रियों ने इसका विरोध किया तो स्टाफ का तर्क था यह नियम है। कोच में सफर कर रहे एक केमिस्ट ने स्टाफ द्वारा दी गई दवाओं को मानक के विपरीत और अपर्याप्त बताया। स्टाफ ने आरपीएफ और जीआरपी की मौजूदगी में मरीज से पैसा वसूला।
अंबाला का रहने वाले श्रवण कुमार परिवार के साथ गंगासागर दर्शन करके पंजाब मेल से आ रहा था। एस टू कोच में उसका आरक्षण था। रास्ते में श्रवण के पुत्र विक्की की तबीयत खराब हो गई। संयोग से उसी कोच में लुधियाना के रहने वाले पेशे से केमिस्ट संजीव भी सफर कर रहे थे। उनको बच्चों की हालत पर दया आ गई। उन्होंने अपने मोबाइल से बच्चे के बीमार होने की सूचना रेलवे के अधिकारियों को दी। कंट्रोल से सूचना मिलने के बाद एसएम इबरार ने इसकी सूचना रेलवे अस्पताल को दी। ट्रेन प्रतापगढ़ रेलवे स्टेशन पर आकर रुकी तो बिना डॉक्टर के रेलवे अस्पताल के दो स्टाफ कोच में घुसे और विक्की को देखने के बाद कुछ दवाएं खाने को दी। बाद में स्टाफ रमाशंकर ने विक्की के पिता श्रवण से फीस के नाम पर बतौर दो सौ रुपये मांगे।
फीस का नाम सुनते ही कोच में बैठे बाकी मुसाफिर चौंक उठे। विरोध करने पर रमाशंकर और वीके पाल फीस लेकर मरीज देखने का रेलवे का नियम बताया और कहा कि इस दो सौ रुपये में सौ रुपये डॉक्टर साहब की फीस है। बाकी सौ रुपये की दवा है। इस पर श्रवण को स्टाफ दौ सौ रुपये देने ही पड़े।
केमिस्ट संजीव कुमार का कहना है कि विक्की की तबीयत वाराणसी के बाद से अधिक बिगड़ने लगी। बाद में उन्होंने रेलवे के हेल्प लाइन नंबर पर मोबाइल से फोन किया। जवाब मिला कि तीन स्टेशनों के बाद प्रतापगढ़ में डॉक्टर की सुविधा मिलेगी। प्रतापगढ़ आया तो रेलवे की चिकित्सा देखकर सब दंग रह गए।
विक्की को जो दवाएं रेलवे अस्पताल के नाम पर दी गईं, उनकी मार्केट वैल्यू बीस रुपये से अधिक नहीं होगी। ऐसा केमिस्ट संजीव कुमार ने दावा किया है। उनका कहना है कि वे खुद भी लुधियाना में केमिस्ट की दुकान चलाते हैं। उन्हें सब पता है। साथ ही दी गई दवाआें में फिजूल की दवाएं अधिक थी। सिर्फ बीस रुपये की दवा देकर दो सौ रुपये वसूले गए।