जनता की सेवा में चौबीस घंटे तत्पर रहने वाले पुलिस कर्मियों को बिजली और पानी के लिए हलाकान होना पड़ रहा है। दो जून की रोटी खुले आसमान के नीचे बनती है। टॉयलेट नही होने से शौच के लिए मैदान का सहारा लेना पड़ता है। एक ही कमरे में पुलिस कर्मियाें को रात बितानी पड़ती है। हर तरह की समस्याएं झेल रहे पुलिस कर्मियों की जिंदगी आदिवासियों की तरह हो गई है।
जिले की सबसे बड़ी कोतवाली लालगंज के अंतर्गत आने वाली लीलापुर व कमौरा चौकी में तैनात दरोगा व सिपाहियों को आदिवासियों की तरह गुजर बसर करना पड़ रहा है। दोनों पुलिस चौकियों की बदहाली देखने के बाद भी अधिकारी मौन साधे हुए हैं। लीलापुर पुलिस चौकी तीन दशकों से लगभग एक किराए के कमरे में चलती है। मकान मालिक को कई वर्षों से कमरे का किराया भी नही मिला। एक कमरे की चौकी में इंचार्ज व आधा दर्जन सिपाही गुजर बसर कर रहे हैं।
कमरे में जगह नही होने से पुलिस कर्मियों ने छप्पर बनवा रखी है। जिसमें दिनभर की थकान के बाद वह बैठकर सुकून महसूस करते हैं। यहां खाने के लिए भी पुलिस कर्मियों को दो जून की रोटी बड़ी मुश्किल से मिलती है। अभी तक खुले आसमान के नीचे चूल्हे पर खाना बनाया जाता था। सर्दी का मौसम आया तो छोटी सी छप्पर ऊपर डाल दी गई। पुलिस कर्मियों को खुले आसमान के नीचे धूल व मिट्टी से सने हुए भोजन लेने पड़ते हैं। वहीं लालगंज की कमौरा पुलिस चौकी का हाल तो और भी बुरा है। कमौरा जंगल के समीप चौकी स्थापित हुई तो स्थानीय लोगों के चंदे से यहां एक कमरा बनकर तैयार हुआ। इसमें दरोगा समेत चार सिपाही व होमगार्ड अपनी गृहस्थी का सारा सामान रखते हैं और रात में एक साथ गुजर बसर करते हैं।
चौकी में न तो बिजली का कनेक्शन है और न ही पीने के लिए हैंडपंप लगा हुआ है। मोबाइल तक चार्ज करने के लिए पुलिस कर्मियों को गावं जाकर स्थानीय लोगों की मदद लेनी पड़ती है। पीने को पानी तभी मिलता है जब वह सुबह दूरदराज से बोतलों में पानी भरकर रख लेते हैं। खाना बनाने के लिए रसोईघर के नाम पर एक छप्पर बना दिया गया है। इसी छप्पर के नीचे चूल्हे पर जंगल से लकड़ियों का इंतजाम करने के बाद दरोगा व सिपाहियों को दो जून की रोटी नसीब होती है। यहां भी पुलिस कर्मियों के लिए टॉयलेट की व्यवस्था नही है। उन्हें शौच के लिए तो बाहर जाना ही पड़ता है साथ ही नहाने के लिए गांव में लगे हैंडपंपों का सहारा लेना पड़ता है।