हर आपराधिक घटना के बाद आम तौर पुलिस ही निशाने पर होती है। बदमाश वारदात कर फरार हो जाते हैं और लोग इसके लिए पुलिसकर्मियों की लापरवाही को जिम्मेदार ठहराने लगते हैं, लेकिन क्या कभी किसी ने इस पर गौर किया है कि पुलिसकर्मी किन हालातों में काम करते हैं। उनके लिए क्या व्यवस्थाएं हैं। उनके पास संसाधन क्या हैं। पुलिस लाइन को छोड़ दिया जाए तो बाकी जगहों पर पुलिसवाले रहते हैं कैसे हैं। यकीन मानिए हालात बेहद खराब हैं। अगर इसके बाद भी विश्वास न हो तो एक बार नगर कोतवाली की मोहनगंज पुलिस चौकी जरूर घूम आइए। कुछ बताने की जरूरत नहीं रह जाएगी।
नगर कोतवाली क्षेत्र में नौ पुलिस चौकियां कागजों पर संचालित हैं। इनमें से मकंद्रूगंज, दहिलामऊ, चिलबिला, मोहनगंज, भुपियामऊ, सिविल लाइंस पुलिस चौकी सबसे पुरानी हैं। इसके अलावा आबादी बढ़ने व विवादों को देखते हुए भंगवाचुंगी, जेल चौकी, सिटी पुलिस चौकी की स्थापना की गई है। मौजूदा समय में नौ पुलिस चौकियों पर दरोगा और पुलिसकर्मी तैनात हैं। नगर कोतवाली क्षेत्र के अंतर्गत मोहनगंज पुलिस चौकी की स्थापना वर्ष 82 में एक घटना के बाद हुुई थी। किराए के मकान में काफी दिनों तक पुलिस चौकी संचालित रही।
उस मकान को खाली करने के लिए भी लोगों से पुलिस की रार हुई। जिलाधिकारी के आदेश पर ग्राम सभा की जमीन आवंटित की गई। इसके निर्माण को लेकर भी ग्रामीण और पुलिस आमने-सामने हुए। करीब तीन वर्ष पहले आसपास के संभ्रांत लोगों की मदद से टीन शेड, सीमेंट ईंट की मदद से पुलिस चौकी का महज ढांचा ही खड़ा किया जा सका।
पुलिस चौकी में अभिलेखों व असलहों को रखने के लिए एक अदद कमरा भी नहीं है। टटिया से दीवार बनाई गई है ताकि बाहरी लोगों की नजर से वे बच सकें। इसके अलावा गर्मी, सर्दी और बरसात के माह में पुलिसकर्मियों को सबसे अधिक समस्या का सामना करना पड़ता है। मौजूदा समय में चौकी प्रभारी व सात पुलिसकर्मी अपनी जान जोखिम में डालकर वे दूसरों की हिफाजत करने के लिए मुस्तैद हैं। पुलिसकर्मी इसी के अंदर किसी तरह रहते हैं।
पृथ्वीगंज पुलिस चौकी का भी अजीबो गरीब हाल है। गांव के पंचायत भवन में चौकी स्थापित हुए करीब तीस वर्ष से अधिक हो गया है। वहां कार्यालय बाहर ही लगता है। जिस स्थान पर सिपाहियों का बिस्तर बिछता है। वहां मौसम की मार से बचने के लिए कार्यालय भी संचालित करना पड़ता है। यहां तक कि ग्राम सभा ने कई बार लिखित पत्र देते हुए किराया मांगा, लेकिन एक भी रुपये किराया नहीं मिला। चौकी पर तैनात पुलिसकर्मियों का रहन सहन बद से बदतर हालत में रहता है। इस ओर अधिकारियों की नजर तक नहीं जाती। घटना होने के बाद पहुंचने वाले अफसर भी वहां से हटने के बाद मातहतों का दर्द भूल जाते हैं।
भंगवाचुंगी पुलिस चौकी की स्थापना करीब पंद्रह वर्ष पहले हुई। चौकी का निर्माण तो नागरिकों की मदद से करा दिया गया। ठीक चौराहे पर स्थापित पुलिस चौकी का आलम यह है कि चौकी इंचार्ज का कार्यालय और पुलिसकर्मियों के बैठने के ठौर के अलावा दूसरी व्यवस्था नहीं है। थके हारे पुलिसकर्मियों को एक पल आराम भी नहीं नसीब होता।