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डूबते सूर्य को दिया अर्घ्य, सुख-समृद्धि की कामना

Tue, 17 Nov 2015 11:18 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़
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प्रतापगढ़। संतान प्राप्ति और सुख समृद्धि की मंगल कामनाके लिए महिलाओं ने छठ व्रत रखा। मंगलवार को देर शाम सई नदी के तट पर पानी में खड़े होकर महिलाओं ने डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया। इस मौके पर बेल्हा देवी घाट पर मेला लगा हुआ था। वहां की रौनक  बस देखते ही बन रही थी। नदी तट का वातावरण भक्तिमय हो गया था।
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वैसे तो छठ पूजा की शुरुआत तीन रोज पहले नहाय-खाय व्रत के साथ ही शुरू हो गई थी। इस पूजा का महत्व सूर्य भगवान की पूजा अर्चना कर उनसे संतान प्राप्ति का आशीर्वाद मांगना है।

साथ ही इस पूजा से जीवन में सुख समृद्धि की भी प्राप्ति का महत्व है। मंगलवार को छठ पूजा के दिन महिलाओं ने इसी मंगलकामना के साथ निर्जला व्रत रखा। शाम को घर से पूजा की तैयारी करके महिलाएं बेल्हा देवी मंदिर पहुंची। सूप में गन्ना, पांच फल और पूजन की सारी सामग्री रखकर नदी में खड़े होकर डूबते हुए सूर्य को दूध और जल से अर्घ्य दिया। पूजा के बाद घर की बुजुर्ग महिलाओं के पैर छूकर उनका भी आशीर्वाद प्राप्त किया। तट के किनारे भगवान भास्कर की प्रतीकात्मक प्रतिमा बनाकर महिलाओं ने उनकी पूजा की। दीपों से आरती उतारी गई। मंगलगीत गाए गए।
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कुछ लोगों ने गाजे-बाजे के साथ छठ की पूजा की। लोग
ढोल-ताशे और डीजे के साथ मंदिर में पहुंचे। मंदिर प्रांगण में आर्केस्टा का भी आयोजन किया गया था। जिसमें कलाकार भक्ति गाने से लोगों को मंत्रमुग्ध कर रहे थे।

छठ व्रत का बीमारी में भी महत्व है। कहा जाता है पानी में खड़े होकर भगवान भास्कर को अर्घ्य देने से चर्म और हड्डी संबंधी रोगों से मुक्ति प्राप्त होती है। बिहार से आए पं.राजाराम चौबे बताते हैं कि डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देने से यह बीमारी दूर हो जाती है। जो लोग सात साल तक लगातार व्रत के दौरान पानी में खड़े होकर अर्घ्य देते हैं उनको चर्म और हड्डी की बीमारी नहीं होती है।

 कहते हैं महाभारत काल में संतान की प्राप्ति के लिए कुंती ने भी भगवान सूर्य की पूजा की थी। उस समय भी छठ पूजन की परंपरा थी। इसमें सूर्य की ही पूजा होती है। जल में दूध मिलाने के पीछे संतान प्राप्ति का तर्क है। निसंतान भी इस पूजा को बड़े मनोयोग से करते हैं।
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