जगह-जगह पंडालों में स्थापित दुर्गा प्रतिमाओं को नदियों में विसर्जन पर प्रशासन ने रोक लगा दी थी। विसर्जन के लिए प्रशासन ने सई नदी के किनारे तालाब खुदवाया था। जिसमें लोगों ने मूर्तियों को विसर्जित किया। मूर्ति बनाने में प्रयोग में लाए गए बांस, पट्टी, जूट आदि को नगर पालिका ने तालाब से निकालकर नदी के तट पर फेंक दिया। सवाल यह है कि फिर विसर्जन के लिए तालाब खुदवाने का क्या औचित्य था। नगरपालिका के इस रवैए से शहरवासियों में आक्रोश है।
नवरात्र पर्व पर नदियों में मूर्ति विसर्जन पर प्रशासन ने पाबंदी लगा दी थी। नगर पालिका ने सई नदी के किनारे तालाब खुदवाकर उसमें विसर्जन करवाया। तर्क दिया गया कि प्रतिमाओं के विसर्जन से नदी में गंदगी फैलेगी। जल प्रदूषित होगा। श्रद्धालुओं ने प्रतिमाओं को तालाब में विसर्जित कर प्रशासन का सहयोग किया। मगर नगर पालिका ने मलबे को हटाने के बजाए उसको नदी में बहने के लिए तट पर ही छोड़ दिया। अब यही मलबा धीरे-धीरे करके नदी में जा रहा है। लोगों ने जब यह नजारा पुल पर खड़े होकर देखा तो जिम्मेदार लोगों के लचर रवैये पर नाराजगी जताने लगे।