जिले में दाल की खपत और उत्पादन में भारी अंतर है। जब दाम आसमान चढ़े तो मुनाफाखोरों के कारनामों के चलते मांग और उपलब्धता का अंतर और गहरा गया। नतीजा दाल की कीमत दो सौ के पार पहुंच गई है। गौर करने वाली बात यह भी है कि जिले में दाल की कोई मिल नहीं है। यहां दाल की जरूरत कानपुर से पूरी होती है। अरहर का जो उत्पादन होता भी है उसे कानपुर भेजना पड़ता है। जिले में प्रतिवर्ष 70 हजार मीट्रिक टन दाल की खपत है, जबकि उत्पादन 12 हजार मिट्रिक टन ही है।
जिले में दाल का संकट गहरा गया है। ग्रामीण और शहरी इलाकों में 210 रुपये प्रति किग्रा बिकने वाली अरहर की दाल थाली से गायब हो गई है। जिले में दलहनी फसलों का उत्पादन होता है, मगर इससे लोगों की मांग पूरी नहीं हो पाती है। कृषि विभाग के आंकड़ों पर गौर किया जाए तो जिले में प्रतिवर्ष 70 हजार मीट्रिक टन दाल की आवश्यकता होती है, मगर दलहनी फसलों का उत्पादन मात्र 12,346 मीट्रिक टन होता है। इसमें सबसे अधिक 10,078 मीट्रिक टन अरहर की पैदावार होती है।
जबकि उड़द, मूंग और चना का भी उत्पादन होता है। जिले का दुर्भाग्य यह है कि यहां कोई दाल मिल नहीं है। इससे जो दलहनी फसल तैयार होती है, उसे किसान व्यवसायियों के हाथों बेचने को मजबूर होते हैं। जिले के व्यवसायी कानपुर में अरहर बेचकर दाल वहां से मंगाते हैं। जिले के थोक विक्रेताओं की मानें तो इन दिनों कानपुर में भी अरहर के दाल की कमी होने से बेल्हा में अधिक दाम पर दाल बिक रही है। अरहर की दाल के साथ ही उड़द, मूंग और चना के भी दामों में इजाफा हो गया है।