जिले के लोगों को सिनेमाहाल में फिल्म देखना सपना सरीखा हो गया है। रूपहले पर्दे पर चलचित्र देखने के लिए लोगों को पड़ोसी जिलों की राह देखनी होगी। शहर तो दूर ग्रामीण अंचलों के सिनेमा हालों को घाटे में चलता दिखाकर मालिकों ने बंद कर दिया। इससे मनोरंजन की ख्वाहिश रखने वालों को झटका लगा है।
किसी जमाने में शहर से लेकर ग्रामीण अंचलों में सिनेमा हालों में तालियों की गड़गड़ाहट गूंजा करती थी। जो रफ्ता-रफ्ता बंद होती गई। केवल शहर में ही आधा दर्जन सिनेमाघर थे। कुंडा में दो, पट्टी, डेरवा, लालगंज में एक-एक सिनेमाहाल थे। जहां दो दशक पहले दर्शकों का ऐसा जमघट देखने को मिलता था कि लोगों को टिकट के लिए दूसरे शो का इंतजार करना पड़ता था। बेहतरीन फिल्मों के लिए तो दर्शकों को ब्लैक में टिकट खरीदना पड़ता था। सिनेमा व्यवसाय से जुड़े लोगों की मानें तो अब सिनेमाहाल चलाना बस की बात नहीं रह गई है।
सरकार के टैक्स, बिजली की अंधाधुंध कटौती के चलते जनरेटर का खर्च, दर्शकों की कमी व कर्मचारियों के मेहनताने को देखते हुए सिनेमाघर बंद कर दिए गए। शहर में सदर बाजार स्थित कुमार पैलेस सबसे पहले बंद हुआ। इसके बाद पल्टन बाजार स्थित वृंदावन टाकीज, निर्मल पैलेस, पवन पैलेस बंद हुआ। काफी दिनों तक लोगों को मनोरंजन से चिलबिला स्थित चंदन पैलेस ने जोड़े रखा, लेकिन 22 जून को यह सिनेमा हाल भी घाटे के चलते बंद कर दिया गया।
जबकि ग्रामीण अंचलों में स्थित सिनेमाहाल कई साल पहले बंद हो चुके थे। सिनेमा व्यवसाय को चौपट करने में सीडी, डीवीडी, केबल नेटवर्क के साथ डीटीएच सेवा का काफी योगदान रहा। इसके चलते सिनेमाहालों में दर्शकों की संख्या नाममात्र की रह गई। सिनेमाघरों में ताला लटकने के बाद अब लोगों को सिनेमाघर में फिल्म देखने के लिए पड़ोसी जनपद जाना होगा। यहां तक की अवकाश के दौरान लोग परिवार के साथ इलाहाबाद जाते हैं।