जिले में भैंस की संख्या तेजी से घट रही है। जबकि गाय पालने वालों की तादाद में बढ़ोतरी हुई है। विगत पांच वर्षों में भेड़, सूकर, खच्चर, गधा और ऊंट की संख्या में भी गिरावट आई है। वहीं बकरी, घोड़े एवं टट्टू की तादाद तेजी से बढ़ी। इस बात का खुलासा हाल ही में तैयार हुई 19 वीं पशुगणना 2012 की रिपोर्ट से हुआ है। इसके पहले वर्ष 2007 में यह गणना सरकार ने कराई थी। उस दौरान जिले में 360711 महिषवंशी पशु जिले में मिले थे। वर्ष 2012 की रिपोर्ट पर गौर करें तो 4531 भैंस प्रजाति के मवेशियों की संख्या कम हो गई है। मौजूदा समय में 356180 महिषवंशी पशु जिले में बताए जा गए हैं। गोवंशी पशुओं में करीब 50949 की वृद्धि हुई है।
वर्ष 2007 में इनकी संख्या 327178 थी। जबकि वर्ष 2012 की सर्वे रिपोर्ट में 378187 गोवंशी पशु पाए गए हैं। मतलब यह कि भैंस की अपेक्षा गाय पालन में बेल्हा की रुचि तेजी से बढ़ रही है। लोग इसे गाय के प्रति लोगों में बढ़ती आस्था का प्रतीक मान रहे हैं। जिले में हाथी के शौकीनों की तादाद में भी इजाफा हुआ है। गणना की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2007 में यहां एक भी हाथी नहीं था। जबकि वर्ष 2012 की तैयार रिपोर्ट में हाथियों की संख्या 66 बताई गई है। बताते चलें कि अब घोड़ा एवं टट्टू की तादाद यहां 3268 हो गई है। जबकि पांच साल पहले 2007 में इनकी तादाद 1911 थी। बकरी पालन के प्रति भी लोगों का रुझान तेजी से बढ़ा है। वर्ष 2007 में यहां कुल 239157 बकरियां थीं, जबकि वर्ष 2012 की गणना में इनकी संख्या बढ़ कर 263750 हो गई है। 34314 से घट कर भेड़ की तादाद 18886 ही बची है। सूकर पालन में भी गिरावट आई है। नई गणना के मुताबिक 106898 से घटकर सूकर संख्या 43938 हो गई है। बताते चलें कि वर्ष 2007 में यहां खच्चर भी 101 थे। पांच साल में 28 की संख्या घट गई। नई गणना में 73 खच्चर ही बचे हैं। इसी तरह 362 की जगह अब जिले में 141 ऊंट ही रह गए हैं।