देश की सीमा पर गोलियां और गोले बरस रहे थे। दुश्मनों की निगाह भारत पर टिकी थी। वर्ष 1965 के भारत और पाकिस्तान युद्ध में जिले का लाल तिरंगे की रक्षा के लिए शहीद हो गया था। शहीद का पार्थिव शरीर दिलीपुर पहुंचा तो उनके फौजी पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो गया।
दिलीपुर निवासी भगौती प्रसाद तिवारी फौज में थे। इकलौते पुत्र जगदीश प्रसाद तिवारी को भी वह फौजी के रूप में देखना चाहते थे। पति के सपनों को देखते हुए उनकी पत्नी ने भी पुत्र को देश की सेवा के लिए तैयार करना शुरू कर दिया। पिता का ख्वाब और मां की मेहनत रंग लाई। भगौती प्रसाद सेवानिवृत्त हो गए घर आ गए। इस बीच जगदीश को फौज में नौकरी मिल गई। इस बहादुर जवान की काबिलियत पर अफसरों को भी गर्व था। वर्ष 1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ। इस जगदीश प्रसाद को अफसरों ने दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए बार्डर भेजा। साथी जवानों संग वह युद्धस्थल पहुंचे और पाकिस्तानी फौजियों का पसीना छुड़ा दिया।
देश की ओर बढ़ते दुश्मनों को ललकारते हुए साथियों संग जगदीश प्रसाद तिवारी उन पर टूट पड़े। दुश्मन चारों तरफ से गोलियां व बम दाग रहे थे। इस बीच लड़ते-लड़ते वह तिरंगे के लिए शहीद हो गए। गांव वाले कहते हैं कि शहीद का पार्थिव शरीर घर आया तो उनके पिता गर्व से बोले, देखो आ रहा है देश के लिए लड़ने वाला मेरा शेर और फिर फफक कर रो-पड़े। कुछ दिनों पहले उनका भी निधन हो गया। करीब तीन साल पहले उनकी पत्नी राजपती देवी भी दुनिया को अलविदा कह गईं। शहीद के पुत्र विनय ने बताया कि कारगिल युद्ध के बाद मां को एक लाख रुपये, प्रशस्ति पत्र और एक मेडल मिला था।