जिले में बीहड़ और बंजर भूमि को सुधारने के लिए प्रतिवर्ष आने वाले करोड़ों रुपये साफ हो गए। गांव के किसानों को ऐेसी जमीनों के सुधार की कोई जानकारी नहीं हो सकी और विभाग की फाइलों में हरियाली लहलहा रही है। अधिकारी भी समीक्षा बैठक में सिर्फ कागज पूरा होने का कालम देखकर अफसरों की पीठ थपथपाते हैं। वह कभी भी स्थलीय जांच की पहल नहीं करते हैं। जिले की बीहड़ और बंजर भूमि को सुधारने की जिम्मेदारी कृषि विभाग की दो इकाइयों भूमि संरक्षण विभाग प्रथम और द्वितीय को सौंपी गई है। इन दोनों इकाइयों में भूमि सेना योजना के तहत नदी और नालों के किनारे स्थित गांवों का चयन कर किसानों की ऊबड़-खाबड़ और बंजर पड़ी जमीनों को उपजाऊ बनाने की कार्ययोजना बनाई जाती है। योजना के तहत खेतों की मेड़बंदी, समतलीकरण के साथ ही किसानों को मुफ्त में खाद और बीज मुहैया कराकर खेती करने के लायक बनाना होता है।
दोनों इकाइयां प्रतिवर्ष 500-500 हेक्टेअर जमीन का चयन कर अपनी योजनाओं को अंतिम रूप देती हैं। अगर हम बीते वर्ष 2014-2015 की बात करें तो दोनों इकाइयों को 1.74 करोड़ रुपये मिले हुए थे। किस किसान का खेत समतल हुआ, किस खेत में मेड़ बंदी हुई और किसे कितना बीज मिला। यह किसान को भले न पता हो, मगर विभाग के पास पूरा आंकड़ा उपलब्ध है। हालांकि विभाग के अफसर यह आंकड़ा देने में अपने को अक्षम बता रहे हैं कि अभी तक विभाग ने कितना बीहड़ और बंजर भूमि को सुधारा है। इससे यह साफ है कि खाऊ-कमाऊ योजना में भौतिक रूप से नहीं, बल्कि फाइलों पर काम हो रहा है। आश्चर्य की बात तो यह है कि जिले अफसर भी सिर्फ फाइलों का ही निरीक्षण करते हैं। भौतिक रूप से सत्यापन की जहमत मोल नहीं लेते हैं। गांव का किसान अगर शिकायत भी करता है तो उसे विभाग के लोगों के पास भेज दिया जाता है। ऐसा लगता है कि शासन में बैठे अफसरों को भी इस खेल की जानकारी हो गई है। इसलिए चालू वित्तीय वर्ष में दोनों इकाइयों का बजट घटाकर 31.77-31.77 लाख कर दिया है। भूमि संरक्षण अधिकारी प्रथम अश्विनी सिंह ने बताया कि लक्ष्य के अनुरूप गांवों का चयन कर बीहड़ और बंजर जमीन को सुधारा जा रहा है। भूमि संरक्षण अधिकारी द्वितीय जेएल गुप्ता ने यह बताने में असमर्थता व्यक्त की कि अभी तक कितने हेक्टेअर बीहड़ और बंजर भूमि सुधारी गई है।