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मौका मिला जवानी मा, दांव खेलब परधानी मा

Tue, 21 Jul 2015 11:13 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़
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‘चौधरियों’ की चौधराहट, मठाधीशों की मुस्कराहट गायब है। प्रधानी के चुनाव में पढ़ी-लिखी नई पीढ़ी की आहट से बौखलाहट है। सिर पर पगड़ी नहीं है। हाथ से हुक्का भी गायब है। घुटने के नीचे तक दिखने वाला खद्दर का कुर्ता भी नहीं नजर आ रहा है। गांवों में गोलबंदी करने और जातीय वोटों को खेमेबंदी से अपने पाले में करने का तजुर्बा भी नहीं। गंवई राजनीति के लिहाज से एकदम अनाड़ी, लेकिन पंचायत चुनाव की तैयारियों में उनके जुटने से बड़े-बड़ों की नींद उड़ गई है। वो लोगों से मिलकर अभी से गांव के विकास का खाका तैयार कर रहे हैं। अपने विकास का मॉडल बता रहे हैं। इसके लिए व्हाट्सएप और फेसबुक का भी बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं। एमबीए और बीटेक की डिग्री लेने के बाद भी उन्होंने गांव का मुखिया बनने की ठान ली है। कुछ इसे राजनीति की पहली सीढ़ी बता रहे हैं तो कुछ का कहना है कि गांवों के विकास के लिए तकनीक जरूरी है। पंचायत चुनाव सितंबर-अक्तूबर में प्रस्तावित है, लेकिन दिलचस्प यह कि उनकी तेजी देखकर प्रधानी को विरासत समझने वालों की छटपटाहट बढ़ गई है। उन्हें अभी से अपनी परधानी जाने का भय सताने लगा है।
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अभी तक ग्राम पंचायतों में प्रधानी की सीट को कुछ लोग बपौती मानते चले आ रहे हैं। या तो वे खुद प्रधान होते हैं या फिर उनके घरवाले। सीट अगर रिजर्व हो गई तो अपना ही कोई आदमी खड़ा कर देते हैं। वो सिर्फ नाम के लिए प्रधान होता है। गांव के इस चुनाव को जीतने के लिए हर जतन किए जाते हैं। वोटरों को अपने पक्ष में करने के लिए दारू, मुर्गा से लेकर दावत और पार्टियां भी खूब होती हैं। लोग वोट लेने के लिए दबंगई और दादागिरी भी होती है, लेकिन इस बार पूरी तरह से तो नहीं, लेकिन कई जगहों पर यह परंपरा टूटने की उम्मीद नजर आ रही है। प्रधानी के चुनाव की तैयारियों में जुटी नई पीढ़ी की फौज अभी से गांव को चमकाने की तरकीब बता रही है। सांगीपुर ब्लाक के पट्टी कचेहरा गांव के अश्विनी कुमार सिंह एमबीए हैं। नौकरी छोड़कर प्रधानी के चुनाव की तैयारी कर रहे हैं। उनका कहना है कि गांव के विकास के लिए तकनीकी जरूरी है। लालगंज के हिमांशु शुक्ला बीटेक हैं और इन दिनों एमटेक की पढ़ाई कर रहे हैं। वह प्रधानी के चुनाव में कूदने के मूड में हैं। इसी तरह रानीगंज के नजियापुर के आदर्श भी बीटेक हैं। मल्टीनेशल कंपनियों में नौकरी करने के बजाए वह प्रधान में दांव आजमाना चाहते हैं। दरअसल ये तीनों लोग तो एक उदाहरण मात्र हैं। जिले में बड़ी संख्या में बीटेक, एमबीए, पीएचडी डिग्री धारक युवा प्रधानी के चुनाव की तैयारियों में जुटे हैं।
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