कान्वेंट स्कूलों में वाहन के नाम पर अभिभावकों की जेब पर डाका डाला जा रहा है। किराए के नाम पर मोटी रकम ऐंठने के बाद भी खटारा बसों में भूसे की तरह ठूंस-ठूंसकर बच्चों को भरा जाता है। शहर का दायरा महज दो से चार किमी की दूरी में सिमटा है, मगर स्कूलों में प्रति बच्चे से किराए के नाम पर 1000-1200 रुपये वसूले जा रहे हैं। कॉपी-किताब, एडमिशन फीस और ड्रेस के साथ अभिभावकों को महंगाई में स्कूल वाहन का किराया भी चुकाना भारी पड़ रहा है।
लालगंड, कुंडा, पट्टी, रानीगंज के साथ ही शहर के कान्वेंट स्कूलों में लूट मची है। बेहतर शिक्षा के नाम पर अभिभावकों को ठगा जा रहा है। दाखिले के समय बच्चों के घर तक बस मुहैया कराने का आश्वासन दिया जाता है और जब प्रवेश हो जाता तो बच्चों को डग्गामार वाहनों में भूसे की तरह ठूंसकर पहुंचाया जाता है।
एक माह में 21 से 22 दिन ही स्कूल में पढ़ाई होती है और किराया पूरे महीने के हिसाब से लिया जाता है। स्कूलों में वाहन के नाम सिर्फ डग्गामार टेंपो हैं। स्कूलों में जो बसें लगी भी हैं, उनकी हालत इतनी खराब है कि कब और कहां धोखा दे जाएं, कुछ भी नहीं कहा जा सकता है।
अफसरों के सामने गुजरते हैं वाहन, बंद कर लेते हैं आंखें
शहर के डग्गामार वाहन बच्चों को भूसे की तरह भरकर ले जाते हैं। यह सब अफसर भी देखते हैं, मगर कार्रवाई के लिए पहल नहीं करते हैं। अफसरों की इस लापरवाही का फायदा निजी स्कूल संचालक उठाते हैं।
हादसे के बाद जागता है एआरटीओ कार्यालय
स्कूली बसों के साथ जब कोई घटना घटती है तो एआरटीओ कार्यालय की नींद टूटती है। बाकी दिनों में सेटिंग के चलते वह न तो कोई पहल करता है और न ही निजी स्कूल अपने आप में सुधार लाते हैं। फिलहाल अगर बच्चों को सुरक्षित रखना है तो स्कूल संचालकों के वाहनों की नियमित जांच होना आवश्यक है।
निजी स्कूल संचालकों को वाहनों के लिए मानक दिए गए हैं। वह बसों में क्षमता से अधिक बच्चों को नहीं बैठा सकते। अगर इस तरह की हरकत कर रहे हैं तो औचक निरीक्षण अभियान चलाकर कार्रवाई की जाएगी।
मनोज सिंह, एआरटीओ।