फोन पर बढ़ता स्क्रीन टाइम, उसकी लत किशोरों और युवाओं पर हावी हो रही है। भागदौड़ भरी जिंदगी में फोन की वजह से लोग तनावग्रस्त हो रहे हैं। मेडिकल कॉलेज में साल-दर-साल मरीजों की संख्या में इजाफा हो रहा है। इस वर्ष में 12 हजार लोग डिप्रेशन की शिकायत लेकर मेडिकल कॉलेज पहुंचे हैं। उनकी काउंसलिंग की गई। इलाज किया गया।
वर्तमान में मेडिकल कॉलेज की मनोरोग की ओपीडी में हर दिन औसतन 40 मरीज पहुंच रहे हैं। स्थिति यह है कि 10 वर्ष के बच्चे भी डिप्रेशन के शिकार हो रहे हैं। मेडिकल कॉलेज के मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉ. अमित कुमार ने बताया कि तनावग्रस्त होनी की सबसे बड़ी वजहों में मोबाइल फोन की लत और भागदौड़ भरी जीवनशैली है।
सुबह जागने से लेकर रात में खाने तक लोग फोन में जुटे रहते हैं। छोटे बच्चे बिना फोन के खाना तक नहीं खा रहे हैं। किशोर स्कूल से लेकर घर तक फोन से सबकुछ कर रहे हैं। युवा पढ़ाई, नौकरी समेत अन्य दबावों को झेल नहीं पा रहे हैं और तनाव में जा रहे है।
तीन साल में ऐसे बढ़े मरीज
2023-24 में - 8,200 मरीज
2024-25 में - 10,500 मरीज
2025-26 में अब तक- 12,000 मरीज
इनसेट
60 फीसदी मरीज 15 से 30 वर्ष के
मेडिकल कॉलेज में तनावग्रस्त 60 प्रतिशत मरीज 15 से 30 वर्ष के हैं। इनमें सबसे ज्यादा मोबाइल एडिक्शन, पढ़ाई का प्रेशर, नींद न आना और चिड़चिड़ापन के मामले हैं। 20 प्रतिशत बच्चे गेमिंग डिसऑर्डर के शिकार हैं।
क्या हैं लक्षण
लगातार उदास रहना, भूख न लगना, नींद टूटना, अकेले रहना, पढ़ाई में मन न लगना, छोटी-छोटी बात पर गुस्सा आना, बार-बार हाथ धुलना, सोते समय अचानक उठकर रोना।
बचाव
प्रेत बाधा में फंसकर किसी तांत्रिक के पास न जाएं।
परिजन अपने बच्चों से रोजाना आधा घंटा संवाद करें।
बच्चों को मोबाइल का उपयोग दिन में दो घंटे से ज्यादा न करने दें।
रोजाना व्यायाम, खेल और आठ घंटे की नींद जरूरी है।
लक्षण दिखने पर सीधे मनोचिकित्सक से मिलें।