संगम तीरे मेले की भीड़ में अपनों से बिछड़ने वाले लोगों को मिलाने का काम करने वाले भारत सेवा दल भूले-भटके शिविर के संस्थापक, समाजसेवी और अधिवक्ता पंडित राजाराम तिवारी शनिवार को दुनिया को अलविदा कह गए। उनका निधन इलाहाबाद में उनके आवास पर हुआ। वह 88 वर्ष के थे। निधन की खबर सुनते ही उनके पैतृक गांव नंद का पुरवा गौरा, रानीगंज प्रतापगढ़ में शोक है। शनिवार को उनका शव इलाहाबाद से पैतृक गांव लाया गया। यहां अभी बाहर रह रहे रिश्तेदारों और परिवारीजनों का इंतजार किया जा रहा है। अंतिम संस्कार इलाहाबाद में किया जाएगा।
राजाराम तिवारी में समाजसेवा का जज्बा शुरू से ही था। इसको पूरा करने के लिये उन्होंने इलाहाबाद संगम पर त्रिवेणी रोड के किनारे भारत सेवा दल भूले-भटके शिविर की स्थापना 1946 में की। हर वर्ष गंगा के तट पर लगने वाले मेले में आने वाले लोगों में से जो लोग अपने परिवार या सगे संबंधियों से बिछुड़ जाते थे शिविर के माध्यम से राजाराम तिवारी उनको मिलाने का काम करते थे। उन्होंने करीब 71 साल तक यह काम किया। मेले में भूले-भटके लाखों निराश लोगों को मिलाकर उनके चेहरे पर मुस्कान लाने वाला शख्स शनिवार को दुनिया को अलविदा कह गया।
हाईकोर्ट में वकालत भी करते थे
शिविर के माध्यम से लाखों लोगों को मिलाने का रिकॉर्ड बनाने वाले राजाराम तिवारी का नाम वर्ष 2008 में लिम्का बुक रिकॉर्ड मेें दर्ज है। उनके भतीजे ज्योतिष ंदिनेश तिवारी बताते हैं कि राजाराम तिवारी समाजसेवा के साथ हाईकोर्ट में वकालत भी करते थे। समाजसेवा के लिये उनको सदी के महानायक अमिताभ बच्चन भी मुंबई के एक समारोह में सम्मानित कर चुके हैं। उन्होंने 14 लाख महिला, पुरुष और 20 हजार बच्चों को मिलाने का काम किया है। उनका निधन इलाहाबाद में हुआ है। उनके पैतृक गांव नंद का पुरवा में शोक की लहर है। ग्रामीणों भी उनके निधन की सूचना से स्तब्ध रह गए। गांव के लोगों उनकी चर्चा करते हुए कहते रहे कि उनका मिलनसार स्वभाव सबको भा जाता है। किसी से भी वह बेहद भावुकता और आत्मीयता के साथ मिलते थे। जब भी गांव आते थे एक-एक लोगों से मिलकर उनका हालचाल जानते थे। कुशलक्षेम पूछते थे। उनका यही व्यवहार लोगों के दिल को छू जाता था।