आरक्षण की व्यवस्था किस तरह से की गई है, यह समझ में नहीं आ रहा है। एक्ट और चक्रानुक्रम का तो पालन हुआ नहीं दिख रहा है। कुंडा तहसील में कुंडा पंचम और बिहार पंचम को आरक्षण के दायरे में दिखाया जा रहा है जबकि यह दोनों सीटें नई बनी हैं। कुंडा पंचम को 2005 से दिखाया जा रहा है तो बिहार को 1995 से। अब इन सीटों को लेकर लोग संशय में पड़े हुए हैं।
जिला पंचायत में कुंडा ही अब तक इतिहास लिखता आ रहा है। चाहे जिला पंचायत अध्यक्ष हो या फिर सदस्यों का पद। जिला पंचायत अध्यक्ष प्रमोद मौर्य भी कुंडा से ही जिला पंचायत सदस्य बनकर अध्यक्ष बने थे। इस बाद कुंडा और बिहार में दो नई सीटें तैयार हो गईं। कुंडा पंचम और बिहार पंचम। इसके चलते कुंडा में चार के बजाए पांच जिला पंचायत सदस्य होंगे। इसके साथ ही बिहार में भी जिला पंचायत के पांच सदस्य होंगे। अंतिम सूची लगने के बाद यहां के लोग संशय में पड़ गए हैं। कुंडा पंचम इस बार नई सीट बनी है। बावजूद इसके जिम्मेदारों ने इसका आरक्षण 2005 से दिखाया है। इसी के अनुरूप सीट को आरक्षित भी कर दिया गया है।
लोग लगातार इस सीट को देखकर भ्रमित हो रहे हैं। सूची में देखने के बाद लोग इसके लिए अपनी तैयारी भी शुरू कर चुके थे, लेकिन अब इस सीट का आरक्षण देख कुछ लोगों ने अपने हाथ दबा लिए हैं। इसी तरह से बिहार पंचम भी नई सीट बनी है, लेकिन इस पर 1995 से आरक्षण दिखाया जा रहा है। चर्चा है कि इन सीटों पर दिया जाने वाला आरक्षण भी सही नहीं है। चक्रानुकम का प्रयोग पुरानी सीटों पर होता है। नई सीटों पर आरक्षण जीरो से शुरू होता है। यानी जनसंख्या को ध्यान में रखकर सीट पर आरक्षण का निर्धारण होता है, लेकिन शासन ने इसकी तरफ कोई ध्यान ही नहीं दिया है। बिहार के जगदेव सहित कुछ लोगों ने इस पर आपत्ति भी की थी, लेकिन आरक्षण पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।