‘आठ बजे सबके बोलावा। सारी तैयारी होई गई बा? हां भइया होई गई बा। केतना लोग बाटेन? लगभग सौ लोग।’ आठ बजे बैठक शुरू हुई। सब जमीन पर बैठे। ‘शुरू करा। सबके सामने मुरगा परोस देय।’ प्रत्याशी बोले, ‘भइया व्यवस्था ठीक बा, आप सब का आशीर्वाद चाही बस जीतै के बा, एकौ वोट छूटै न चाही।’ हर मतदाता की आवाज, ‘बस ठीक भैया ठीक बा, आप चिंता तनिको जिन करा।’ जब तक खाने का दौर चला हर कोई प्रत्याशी के शान में कसीदे पढ़ता रहा। बैठक खत्म हुई सब वादा निभाने की बात कर चले गए। अगले दिन दोपहर में जब यही प्रत्याशी प्रचार के लिए निकले तो पता चला कि किसी दूसरे उम्मीदार के यहां दारू की पार्टी चल रही है।
रात में जो वोटर इनके यहां मुर्गा खा रहे थे वही वहां बैठकर दारू पीने में मशगूल थे। प्रत्याशी बेचारा चकरा गया। शाम को फिर वही मतदाता तीसरे उम्मीदार के यहां पूड़ी-सब्जी खाने पहुंच गए। यह तो बस बानगी भर है। दरअसल, मतदाताओं ने प्रधान पद के प्रत्याशियों को बुरी तरह से उलझाकर रख दिया है। वे अपने पत्ते नहीं खोल रहे हैं। फंडा सिर्फ एक है जिसकी पार्टी उसमें मौज। सीधे तौर पर किसी को इनकार नहीं कर रहे हैं। इससे प्रत्याशियों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। अपने दो-चार करीबी लोगों को छोड़कर उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि कौन उनके साथ है और कौन उनके विरोध में। पूरी ताकत और जमकर पैसा खर्च करने के बाद भी वे जीत को लेकर आश्वस्त नहीं है। हर गांव में ऊहापोह की स्थिति बनी हुई है। वोटर इतने तेज कि सबको बारी-बारी से आंक रहे हैं।
पैसा खर्च कराने के साथ उनकी प्रशासनिक हनक भी आंकी जा रही है। मौका ताड़कर हर कोई प्रत्याशियों को कोई न कोई काम पकड़ा दे रहा है। कोई घर के सामने रास्ता बनवाने की बात कह दे रहा है कोई पेंशन दिलाने की। किसी को कुछ नहीं सूझ रहा तो छोटे-मोटे सामान की डिमांड कर दे रहा है। प्रत्याशी लाख समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि चुनाव जीतने और प्रधान बनने के बाद सारी समस्याएं दूर करा दी जाएंगी, लेकिन सुनने के लिए कोई तैयार नहीं। बस एक टका सा जवाब, ‘भइया प्रधान भये के बाद के सुनत था, अबै जवन कै देबा तवन ठीक बा ना हीं त बाद में कुछ नाई होत’ मरता क्या न करता। प्रत्याशी जैसे-तैसे वोटरों की डिमांड पूरी करने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं। बावजूद इसके वोट उन्हें ही मिलेगा, इसे लेकर वे खुद आश्वस्त नहीं हैं।