जनता के फैसले के बाद अब जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर कब्जे के लिए जिले में सियासी सरगर्मी तेज हो गई है। सोमवार को जिला पंचायत सदस्यों के नतीजे आने के बाद कद्दावरों में राजनीतिक जंग शुरू हो गई है। जोड़तोड़ की राजनीति और सियासी खींचतान के बीच जिला पंचायत सदस्यों को अपने पाले में करने के लिए हर जतन किए जा रहे हैं। ऊंट किस करवट बैठेगा यह तो भविष्य के गर्भ में छिपा है, लेकिन कोई भी अपने को कम मानने के लिए तैयार नहीं है। दिग्गज इस सीट को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़कर चल रहे हैं।
जिले में जिला पंचायत के कुल 61 सदस्य हैं। ऐसे में जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर कब्जे के लिए कम से कम 31 सदस्यों का होना जरूरी है। चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद जो तस्वीर सामने आई है उससे अभी कोई भी यह कहने की स्थिति में नहीं है कि अध्यक्ष की कुर्सी पर उसका कब्जा हो जाएगा। मतलब साफ है कि बिना जोड़तोड़ के कुर्सी पर कब्जा पाना आसान नहीं होगा। कुंडा में राजाभैया समर्थित पांचों उम्मीदवार चुनाव जीत गए हैं। सदर तृतीय से उनके करीबी विनय सिंह और सदर द्वितीय से लाल साहब ने भी मैदान मार लिया है। संडवा चंद्रिका द्वितीय और तृतीय से जीतने वाले जिला पंचायत सदस्य भी उनके नजदीकी माने जा रहे हैं। जबकि 11 जिला पंचायत सदस्यों को उन्होंने निर्विरोध निर्वाचित करा दिया था।
अगर इस आधार पर आंकलन किया जाए तो राजाभैया के खेमे में कुल 20 जिला पंचायत सदस्य हैं। इसके बाद भी जिला पंचायत अध्यक्ष कुर्सी पर कब्जे के लिए उन्हें कम से कम 11 जिला पंचायतों सदस्यों की जरूरत होगी। माना जा रहा है कि नया अध्यक्ष बनाने में राजाभैया की भूमिका अहम होगी। दूसरी तरफ निवर्तमान जिला पंचायत अध्यक्ष प्रमोद मौर्य भी संडवा चंद्रिका प्रथम से चुनाव जीत गए हैं। हालांकि उनकी पत्नी को हार का सामना करना पड़ा है। बावजूद इसके उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी है। दावा कर रहे हैं कि जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर फिर इनका कब्जा होगा। अभी से कई जिला पंचायत सदस्य उनके संपर्क में हैं। ऐसे में मुकाबला दिलचस्प हो गया है। जिले के कुछ और बड़े सियासी दिग्गज भी अध्यक्ष की कुर्सी पर नजर गड़ाए बैठे हैं। अध्यक्ष चुनने में उनकी भी भूमिका महत्वपूर्ण होगी। ऐसे में जोड़तोड़ के साथ शिकवे और शिकायतें भूलाकर मेल-मिलाप का दौर शुरू हो गया है। कुर्सी पर कब्जे के लिए घमासान मच गया है।