‘भैया घर पहुंचना है लक्ष्य, पैरों में छाले नहीं गिनना है।’ यह शब्द उन मजदूरों के हैं जो शरीर को बेधने पर आमादा धूप में छाले पड़े पैरों की परवाह न करते हुए बेइंतेहा दर्द की गठरी लिए पैदल चले जा रहे हैं। ट्रक-टेंपो और पैदल चलते हुए सात दिन के सफर के बाद गुजरात के सूरत से निकले मजदूर रविवार की रात प्रतापगढ़ पहुंचे। उन्हें बहराइच जाना था। पैरों में छाले थे, लेकिन किसी भी हाल में घर पहुंचने की जिद थी।
जिले में ट्रक, टेपों और पैदल चलकर बाहर से श्रमिकों के आने का सिलसिला जारी है। शासन की रोक के बावजूद वह मान नहीं रहे हैं। उन पर हर हाल में अपने घर पहुंचने का जुनून सवार है। पैदल चलने वाले मजदूर अपने पैरों के छाले नहीं देख रहे हैं, बल्कि वह अपने घर की दूरी कम करने में लगे हुए हैं। बहराइच जिले के सदर ब्लाक के निवासी सुरेंद्र पाल, अजय पाल, नितिन, रिजवान, कल्लू गौड़ सूरत में रहकर एक फैक्ट्री में काम करते थे। लॉकडाउन में फैक्ट्री बंद होने के बाद कुछ दिनों तक उन्होंने किसी तरह गुजारा किया, लेकिन फिर उनके सामने रहने और खाने की समस्या खड़ी हो गई। इस पर वह घर के लिए निकल पड़े। सूरत से ट्रक से चले, लेकिन यूपी की सीमा पर पहुंचते ही चालक ने उन्हें उतार दिया।
इसके बाद जब साधन नहीं मिला तो पैदल ही चल दिए। प्रयागराज पहुंचे तो एक टेंपों मिला, मगर वह प्रतापगढ़ के लिए पांच हजार रुपये मांग रहा था। जेब में रुपये नहीं होने पर पैदल ही चलना प्रारंभ कर दिया। सुरेंद्र पाल ने बताया कि सूरत से सात दिन में बेल्हा पहुंचा हूं। दिन में धूप अधिक होने के कारण चलना मुश्किल होता है, शाम ढलते ही मंजिल की ओर निकल पड़ता हूं। रात में अंधेरा होने के कारण मोबाइल की रोशनी में अपनी यात्रा पूरी करता हूं। इधर, जिले में ट्रक और मिनी ट्रकों से प्रवासी मजदूरों के आने का सिलसिला भी जारी है। यूपी सरकार के पाबंदी लगाने का इतना असर जरूर है कि अब लोग ट्रक के ऊपर तिरपाल डालकर आ रहे हैं। जिससे रास्ते में पुलिस वाले भी नहीं रोक रहे हैं।