प्रतापगढ़। केन्द्र सरकार की मनरेगा योजना बेल्हा में परवान नहीं चढ़ पा रही है। हजारों जॉब कार्ड धारकों को काम नहीं मिल सका। काम नहीं मिलने से गरीब तबके के लोग गैर जनपदों व प्रांतों में भटकने को मजबूर हैं। हाल ये है कि वित्तीय वर्ष समाप्त होने में चंद माह ही बचे हैं। फिर भी मनरेगा की रफ्तार गति नहीं पकड़ पा रही। हैरत यह है कि साल भर में महज 403 परिवारों को ही 100 दिन काम मिला है, जबकि इस योजना में काम की मांग करने वाले हर मजदूर को 100 दिन का काम दिए जाने का प्राविधान है।
बेरोजगार मजदूरों को काम देने व विकास की गति को बढ़ाने के उद्देश्य से मनरेगा योजना शुरू की गई। मगर जिला प्रशासन मनरेगा का संचालन नहीं कर पा रहा। इस स्थिति में काफी हद तक ग्राम पंचायतें भी दोषी मानी जा रही हैं। ग्राम पंचायतें विकास कार्य का प्रस्ताव ब्लाकों को नहीं भेज पा रही हैं। ऐसी स्थिति में पूरे साल मजदूरों के आगे काम का अभाव रहा। स्थिति यह है कि काम मांगने के बावजूद हजारों परिवार का हाथ खाली है। उनमें से ज्यादातर लोग रोजगार की तलाश में गैरजनपद व प्रांत जाने को मजबूर हैं।
काम पाने वाले मजदूरों की संख्या ही मनरेगा के तहत कराए जा रहे विकास की बदतर दशा का फर्दाफाश करती है। हाल ये है कि अफसर जवाब देने से बचने के लिए मोबाइल भी रिसीव नहीं करते। स्थिति की वजह जानने के लिए डीपीओ रंजीत सिंह से कई बार मोबाइल पर सम्पर्क का प्रयास किया गया, मगर उनका फोन नहीं उठा।
मनरेगा में हो रहे घपलों को देखते हुए सरकार ने ऑनलाइन का ताला जड़ दिया है। पहले पैसा जिले में आता था और यहीं से मजदूरों व ग्राम पंचायतों के खाते में भेजने की प्रकिया थी। मगर बदली व्यवस्था में काम करने वाले मजदूरों का पैसा सीधे शासन से उनके खाते में भेजा जाता है। ग्राम पंचायतें कार्य का प्रस्ताव भेजती हैं। खरीदी गई सामग्रियों का भुगतान भी सीधे संस्था को ही किया जाता है। नई व्यवस्था में खाऊ कमाऊ नीति पर काफी हद तक ब्रेक लग गया। शायद यही वजह है कि प्रधानों और अधिकारियों ने मनरेगा पर ध्यान देना ही बंद कर दिया है और इसका असर योजना के संचालन पर पड़ने लगा है। मजदूरों को काम नहीं मिल पा रहा है।