दीपावली पर इस बार देसी सूरन बहुत कम लोगों को ही नसीब हो सकेगा। बाजार में चारों तरफ बंबइया सूरन छाया हुआ है। दरअसल स्थानीय किसानों की सूरन की खेती में रुचि न लेने के कारण इसकी पैदावार न के बराबर है। ऐसे में सूरन की डिमांड महाराष्ट्र से पूरी हो रही है। दिवाली पर भी इसी की ज्यादा बिक्री होगी।
दीपावली के त्यौहार पर सूरन की मांग काफी बढ़ जाती है। कुछ लोग इसे धार्मिक मान्यताओं से जोड़कर देखते हैं तो कुछ सेहत से। अचानक मांग बढ़ने से सब्जी के कारोबारी भी इसका भरपूर फायदा उठाते हैं। पहले बड़ी संख्या में जिले और आसपास के जनपदों के किसान सूरन की खेती करते थे। जिससे आसानी से लोगों को यह उपलब्ध भी हो जाता था, लेकिन अब स्थानीय स्तर पर सूरन की खेती न के बराबर हो रही है। इसके कारण सूरन महाराष्ट्र से मंगाना पड़ रहा है।
दिवाली पर होने वाली कमाई को देखते हुए व्यापारी अभी से सूरन कोल्ड स्टोरेज में डंप कर रहे है। जिससे त्यौहार के मौके पर भरपूर मुनाफा कमाया जा सके।
सितंबर माह में 40 से 60 रुपये किलो बिकने वाला सूरन अब इन दिनों 70 से 80 किलो बिक रहा है। सब्जी कारोबारी रामनिहोर ने बताया कि इस बार देशी सूरन कम मिलेगा। इसके चलते उसकी कीमत 150 रुपये किलो तक हो सकती है। बंबइया सूरन भी 80 से 100 रुपये किलो बिकेगा।
व्यापारी अनुराग मौर्य, थोक सब्जी विक्रेता मोहम्मद अख्तर ने बताया कि दीपावली के दो से चार दिन पहले देशी सूरन बाजार में आएगा, लेकिन उससे सभी लोगों की पूर्ति नहीं होगी।
देसी और बंबइया सूरन में अंतर
देशी सूरन लोगों के घर के आसपास खुद से उग जाता है। लोग दो से तीन साल तक उसकी खुदाई नहीं करते हैं। इसके बाद खोदकर निकालते हैं। एक सूरन का वजन कम से कम 7 से 10 किलो तक होता है। कटा हुआ सूरन हाथ में लगते ही खुजली होने लगती है। खाते समय गले में कुछ खुजलाहट जैसी होती है। इसलिए लोग सब्जी बनाते समय नीबू या फिर खट्टापन के लिए कुछ न कुछ प्रयोग करते हैं। वहीं बंबइया सूरन खाने में आलू जैसे लगता है। उससे किसी प्रकार का फायदा या नुकसान नहीं होता है।