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अज्ञानता है धर्म व जातीयता के नाम पर हिंसा : बाबा हरदेव

Sat, 13 Dec 2014 10:24 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, प्रतापगढ़
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जाति और धर्म की दीवार में बंटे लोगों को निरंकारी संत बाबा हरदेव सिंह जी महराज ने इंसानियत और एकता का संदेश दिया। शहर के रामलीला मैदान में आयोजित सत्संग में जनपद सहित दूर-दराज से करीब एक लाख से भी अधिक अनुयायियों को वह संबोधित कर रहे थे। खराब मौसम और ठंड के बीच शनिवार को यहां हुए सत्संग में उन्होंने लोगों को बड़े ही सहज तरीके से इंसानियत का कर्तव्य समझाया।
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कहा कि धर्म लोगों को सत्य का पैगाम देता है। जीवन में सत्य की अहमियत से अनुयायियों को रूबरू कराते हुए उन्होंने कहा कि अज्ञानता का बादल जीवन में अंधकार लाता है। इंसानियत की कमी से इंसान बेकार हो जाता है। कहा कि भाषा, जाति, मजहब, अमीरी और गरीब की दीवार में बंट कर लोग अपना ही नुकसान कर रहे हैं, और दोष ईश्वर को देते हैं। उन्होंने कहा कि लोगों को ईश्वर ने सोचने व समझने की शक्ति दी है, अज्ञानता नहीं। जातीयता और धर्म के नाम पर लड़ाई, बलवा व हिंसा जैसी अज्ञानता से उबरने की जरूरत है। सवाल किया कि इंसान ही इंसान को दूर करेगा तो बचाएगा कौन? कहा कि इंसानियत आसान नहीं है।

अनुयायियों से ठसा-ठस भरे रामलीला मैदान में निरंकारी सत्संग ठंड और खराब मौसम पर काफी भारी पड़ी। आस्था के रस में डूबे सत्संगी गुरु महिमा पर हो रहे भजन को सुन कर थिरकते रहे। नमस्कारी के लिए लगी लंबी कतार का छोर देख लोग अपलक निहारते रहे। भीड़ के बीच आस्था से हाथ जोड़ तमाम लोग थोड़ी-देर देर में खड़ा हो कर नमस्कार करते रहे।
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जब तक मंचासीन निरंकारी संत बाबा हरदेव सिंह जी महराज के नमस्कार के लिए बेताब लोग जयकारा और उनकी महिमा का गुणगान करते रहे। तमाम लोगों के भजन कीर्तन जयकारा और तालियों की गड़गड़ाहट की मधुर आवाज लोगों के दिल में आस्था की दास्ता बयां कर रही थी। चलती फिरती भीड़ के बीच शोर शराबा भी रहा। गौर करने वाली बात यह रही कि बाबा के माइक पकड़ते ही अचान कोलाहल भरी फिजा खामोश हो गई। जो जहां पर रहा वहीं ठहर सा गया। सभी के कान बाबा को सुनने के लिए खड़े हो गए।

सत्संग को लेकर निरंकारियों ने रामलीला मैदान को सजा रखा था। चौबंद व्यवस्था के बीच अपार भीड़ के बावजूद सभी खुद को महफूज महसूस कर रहे थे। ऐसा इसलिए कि किसी को भी मैदान तक पहुंचे या भटकने जैसी समस्या का भय नहीं रहा। पूरे मैदान में निरंकारी सेवा दल के लोगों का कब्जा रहा। सेवा दल एक मुस्तैद सिपाही की तरह बड़े ही शालीन शब्दों में लोगों सहेजते हुए भीड़ पर पूरी तरह कंट्रोल किए हुए थे। इतना ही नहीं मंच तक पहुंचने या भीड़ से निकलने में तनिक भी किसी को तकलीफ में देखते ही गाइड मदद के लिए उसके पास पहुंच जाता था।
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