नवरात्र के छठे दिन आदि शक्ति दुर्गा के कात्यायनी रूप की शहद और साबुत हल्दी से विधि-विधान से पूजा की गई। अर्थ, धर्म, कर्म, मोक्ष आदि की प्राप्ति की कामना रखने वाले श्रद्धालुओें की भीड़ मां बेल्हादेवी मंदिर समेत सभी देवी मंदिरों में रही। आकर्षक ढंग से सजे दुर्गा पंडाल नवरात्र की शोभा में चार चांद लगा रहे हैं।
माता कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत ही भव्य व दिव्य है। इनकी चार भुजाएं हैं। वाहन सिंह है। छठे दिन मां के इसी स्वरूप की पूजा घर-घर हुई। भक्तों ने लकड़ी से निर्मित चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर उस पर कात्यायानी की मूर्ति अथवा चित्र स्थापित करके शुद्ध घी का दीपक लगातार पूजन तक प्रज्ज्वलित रखा।
देवी को प्रसन्न करने के लिए चंद्रहासोज्वलकरा शार्दूलवरवाहना। कात्यायानी शुभं दघ्यतिवि दानवघातिनी।। मंत्र का श्रद्धापूर्वक जप करते हुए लाल पुष्प और कनेर आदि अर्पित किया। प्रसाद के रूप में शहद का प्रयोग किया। सुख शांति के लिए मां पर साबुत हल्दी चढ़ाई गई। मान्यता है कि महर्षि कात्यायन ने मां भगवती को अपनी पुत्री के रूप में प्राप्त करने की अभिलाषा के साथ वन में कठोर तपस्या की थी।
महिषासुर नामक एक राक्षस से अत्याचार से मुक्ति दिलाने के लिए त्रिदेवों के तेज से एक कन्या का जन्म हुआ, जिसने अपनी असीम शक्ति और तेज के बल पर महिषासुर का अंत कर दिया था। कात्य गोत्र में जन्म लेने के कारण ही देवी भगवती कात्यायनी कहलाई। शहर के साथ ग्रामीणांचल में सजी दुर्गा प्रतिमाओं के पंडालों से रौनक बढ़ गई है।