100 हेक्टेअर का बड़ा दायरा। पानी के बीच में चारों तरफ रंग-बिरंगे कमल और सारस, पोरिस, साइबेरियन, जूही, चैता जैसे देशी-विदेशी परिंदों की चहचहाहट। यह स्थितियां एक बार किसी का भी ध्यान आकर्षित कर सकती हैं। कभी यह नजारा दाउद पर झील में भी देखने को मिलता था। लोग अनायास खींचे चले आते थे, लेकिन अनदेखी और प्रशासन की उदासीनता का नतीजा रहा कि अब इसका अस्तित्व न के बराबर रह गया है। कभी 100 हेक्टेअर में फैली झील अब मात्र 35 हेक्टेअर में सिमटकर रह गई है। विदेशी परिंदे की चहचहाहट गुम हो गई। बस संतोष की बात इतनी है कि झील में पानी बना रहता है।
पट्टी तहसील के दाउदपुर में स्थित इस झील को दाउदपुर (हरिपुर) स्टेट के राय विश्वेश्वर दत्त सिंह ने 1910 के आसपास संरक्षित करने का प्रयास किया था, लेकिन सफल नहीं हो सके।
इसी के बगल उन्होंने 25 बीघे जमीन कुडा धाम के लिए दे दी। जहां लोगों का बराबर आना-जाना लगा रहा, लेकिन इसे भी संरक्षित करने का प्रयास नहीं किया गया। बाद में जल संचयन को लेकर प्रो. श्याम नारायण तिवारी ने भी काफी सुधार के प्रयास किए। झील को ड्रेन से जोड़ने की मांग उठाई, लेकिन उनका प्रयास भी रंग नहीं ला सका। कभी यहां पोरिस, साइबेरियन, जूही, चैता दुर्लभ प्रजातियों के पक्षियों का जमावड़ा होता था। झील से सटे गांव के लोगों के जेहन में वे नजारे अब भी याद हैं। गांव के लोग बताते हैं कि बच्चे शाम होते ही झील के आसपास जुट जाते थे। तब बाहरी पक्षियों को पानी में अठखेलियां करते देखना मन को गुदगुदाता था और लोग आनंदित होते थे। अब वह सब लुप्त हो गया है।
चकबंदी के पूर्व राजस्व अभिलेखों में यह झील 100 हेक्टेअर यानि 420 बीघा दर्ज थी। अब यह झील अभिलेखों में सिर्फ 36 हेक्टेअर ही बची है। समय के साथ यह झील भले ही सिमटती गई, लेकिन कभी सूखी नहीं। खेतों में सिंचाई के नाम पर भी इस झील के अस्तित्व को काफी क्षति पहुंचाई गई। इस झील से नहर ड्रेन निकाले जाने की वजह से इसका और सत्यानाश हो गया। वर्तमान में इस झील के काफी बड़े हिस्से पर लोगों ने कब्जा जमा लिया है। अब यहां विदेशी पक्षियों की आवाजाही बंद हो गई है झील की जमीन पर लोग खेती कर रहे हैं। कब्जे की बाबत स्थानीय लोगों ने कई बार प्रशासन को अवगत कराया, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। प्रशासन की इस लापरवाही से जनपद की यह विरासत गुम होने के कगार पर है।