पान का जिक्र आते ही आमतौर जेहन में बनारस छा जाता है। ऐसा होना भी लाजिमी है, लेकिन बहुत कम लोग ही यह जानते हैं कि काशी के पान दरीबा की संकरी गलियों में जिस देशी पान को पकाकर सफेद किया जाता है वह अपने बेल्हा में भी पैदा होता है। सरकारी अनुदान से वंचित और कुदरत की मार से बर्बाद किसान अब भी अपनी पुश्तैनी खेती को बचाने के लिए जोर आजमाइश कर रहे हैं। एक जमाने में इस इलाके में 500 एकड़ से भी अधिक क्षेत्रफल में पान का भीटा लगता था, मगर लगातार हो रहे नुकसान और पान को तैयार करने में आने वाली परेशानियों को देखते हुए धीरे-धीरे किसान इससे किनारा करते गए। अब कुछ किसान ही परंपरा को जिंदा रखने के लिए जूझ रहे हैं।
एक समय था जब मंगरौरा इलाके में गांव के लोगों की आय का मुख्य आधार देशी पान हुआ करता था। कम लोग ही जानते होंगे कि इस जिले में सबसे ज्यादा देशी पान का उत्पादन होता था। न सिर्फ जिले के लोगों के लिए बल्कि बनारस समेत देश के विभिन्न हिस्सों और पाकिस्तान, नेपाल व चीन तक देशी पान का गट्ठर भेजा जाता था। सरकारी उदासीनता और किसानों को प्रोत्साहन न मिलने का नतीजा यह हुआ कि अब इसका अस्तित्व खत्म हो जा रहा है। चिलबिला की महुली मंडी में मंगरौरा के देशी पान का गट्ठर अब तैयार नहीं होता है। पान मंडी अब वीरान हो गई है। कभी पट्टी तहसील से सटे मंगरौरा क्षेत्र के चौरसिया (बरई) बिरादरी के लोगों के जीविकोपार्जन का एकमात्र साधन पान की बागवानी हुआ करती थी। अब युवा पीढ़ी के लोग इससे दूर भाग रहे हैं। यही कारण है कि जहां पहले क्षेत्र में 500 एकड़ क्षेत्र में पान का बरेजा (भीटा) लगाया जाता था वह अब सिमटकर बहुत कम हो गया है। पहले अकेले पट्टी तहसील के बेलारामपुर, भिवनी, कंसापट्टी, सेतापुर, लखनीपुर, बीरापुर खुर्द, महदहां, मरियमपुर, वारीकला, रेडीगारापुर, कानूपुर, सहित कुल 49 गांवों में पान की बागवानी की जाती थी। पान की खेती में आधुनिक तकनीकी व जानकारी का अभाव और सरकारी उदासीनता के चलते किसानों की कमर टूट गई।