आजादी के पहले कस्बे में अंग्रेजों द्वारा स्थापित हुई अंतर्राज्यीय खाद गोदाम का अस्तित्व खत्म हो गया है। अंग्रेजी हुकूमत के दौरान इंग्लैंड समेत अन्य देशों में बनी खाद यहां लाई जाती थी। 1911 बनी गोदाम में आने वाली खाद की सप्लाई देश के कोने-कोने में होती थी। आजादी के बाद जब उत्तर प्रदेश में सहकारी समितियों का गठन किया गया तो गोदाम में ताला लग गया। बाद में देखरेख के अभाव में देश की पुरानी खाद गोदामों में शामिल इस विरासत का अस्तित्व समाप्त हो गया।
देश के आजाद होने के पहले अंग्रेजी हुकूमत के दौरान क्षेत्र के लोगाें की आय का मुख्य स्रोत खेती होती थी। फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए भारत में खाद फै क्ट्रियों में नहीं बनती थी। खेतों में फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए गोबर को सड़ाकर खाद के रूप में प्रयोग किया जाता था। ब्रिटिश हुकूमत के दौरान अंग्रेजों का व्यवसायिक कामकाज लखनऊ-वाराणसी राजमार्ग से होता था। इसके लिए बीच में अंग्रेजों ने लालगंज को रुकने का उचित जगह चुन ली। अंग्रेेज यहां रुकने लगे तो सबसे पहले डाक बंगला बनवाया। प्रवास के दौरान अंग्रेजी हुकूमत के शासकों ने देखा कि इलाके के किसान फसलों के उत्पादन में गोबर को खाद में प्रयोग करते थे तो उन्होंने 1911 में यहां खाद की गोदाम की स्थापना कर दी। इसके बाद इंग्लैंड समेत अन्य पश्चिमी देशों में बनने वाली खाद का आयात किया जाने लगा। इसको किसान अपने खेतों में प्रयोग करने लगे। इसके बदले में अंग्रेेज लगान के साथ खाद का दाम भी वसूल करने लगे।
धीरे-धीरे गोदाम पर खाद का आयात बढ़ने लगा और थोड़े ही दिनों में यहां से प्रदेश के अन्य हिस्सों में भी खाद की सप्लाई होने लगी। बताया जाता है इस गोदाम में उतरने वाली खाद को बेचने के लिए बिहार, मध्य प्रदेश और कोलकाता के साथ ही देश के पूर्वी इलाके में भेजा जाने लगा। अंग्रेज इस गोदाम को अंतर्राज्यीय खाद गोदाम के रूप में इस्तेमाल करने लगे। यहां भारी तादात में खाद विदेशों से लाकर रखी जाने लगी। कारोबार में भारी बढ़ोतरी होने के साथ ही गोदाम अंतर्राज्यीय खाद गोदाम के रूप में देश भर में प्रसिद्ध हो गई। लगभग चार दशक तक यहां की गोदाम से अंग्रेजों का कारोबार फलता फूलता रहा। आजादी के बाद किसानों को खाद उपलब्ध कराने के लिए पंचायत स्तर पर सहकारी समितियों का गठन कर दिया गया। समितियाें के गठन के बाद देश की नामी लालगंज की खाद गोदाम में ताला लटक गया। इसके चलते धीरे-धीरे गोदाम का अस्तित्व समाप्त हो गया। गोदाम के कुछ हिस्से आज भी बचे हुए हैं।
गोदाम के भवन में खुल गए तहसील के कार्यालय
लालगंज। 1986 में लालगंज तहसील को मंजूरी मिल गई। इसका कार्यालय खोलने के लिए जिला प्रशासन को समुचित जगह नहीं मिल पायी तो इसी खाद गोदाम के भवन में तहसील के कार्यालय खुल गए। कई वर्षों बाद जब तहसील के नए भवन की मंजूरी मिल गई तो पुराने खाद गोदाम के भवन को जमींदोज कर नया निर्माण करा दिया गया। लेकिन अब भी तहसील के आस पास गोदाम भवन के कुछ हिस्से जर्जर हाल में देखने को मिलते हैं।
गोदाम में रखे जाते थे खेती के यंत्र व बीज
लालगंज। खाद गोदाम जब अपने अस्तित्व में थी तो यहीं पर खेती में प्रयोग किए जाने वाले यंत्र व बीज भी रखे जाते थे। खाद लेने पहुंचने वाले किसानों को खेती के उपकरण भी दिखाए जाते थे। खरीदार को इसे उपलब्ध भी कराया जाता था। यहां आने वाले उपकरणों को आस पास जिलों में बेचने लिए भेजा जाता था। आजादी के बाद खाद तो लोगों को सहकारी समितियों से मिलने लगी, लेकिन उपकरणों व बीज के लिए किसानों की परेशानी को देखते हुए बाद में लालगंज में कृषि रक्षा इकाई का कार्यालय खोल दिया गया।