वन प्रभाग रेंज में 1981 में स्थापित टशर उद्योग केंद्र से बनने वाले रेशम के कपड़े देश भर में मशहूर थे। रेशम के कीट पाल कर बनाए जाने वाले बेशकीमती रेशमी कपड़े व धागे देश के कोने कोने में भेज जाते थे। लेकिन दशक भर बाद ही प्रदेश सरकार ने घाटा बताकर टशर केंद्र को बंद कर दिया। बाद में किसी ने इसकी सुध नहीं ली तो यहां लगी मशीने वापस मंगा ली गई। इसके साथ ही रेशम उद्योग के लिए लालगंज की पहचान देश में खत्म हो गई। बस बचा है तो टशर केंद्र का वह जर्जर भवन जहां रेशमी कपड़े व धागे बनाए जाते थे।
प्रदेश सरकार ने 1977 में लालगंज वन प्रभाग की स्थापना की थी। यहां तैनात हुए पहले रेंजर आरपी सिंह को तत्कालीन मंडलीय अधिकारी कंजरवेटर एमके तिवारी ने 1978 में विहार के रांची (अब झारखंड में) स्थित रेशम उत्पादन केंद्र प्रशिक्षण के लिए भेेजा। प्रशिक्षण के बाद वह वापस आए तो शासन ने 1981 में लालगंज के वन प्रभाग परिसर में टशर उद्योग केंद्र की स्थापना कर दी। इसमें रेशम के कीटों को पाल कर उनसे धागे व रेशमी कपड़े बनाए जाने का काम शुरू किया गया।
इसके लिए वन प्रभाग परिसर में लगे अर्जुन के पेड़ों पर लाखों की संख्या में रेशम के कीटों को पाला गया। पक्षियों से रेशम के कीटाें की रखवाली के लिए कर्मचारियों का तैनात किया गया था। कीटों से निकलने वाले रेशम से बनाए जाने वाले कपड़े व धागे के लिए टशर केंद्र में कई मशीनें लगाई गई थी। जिसमें बुनाई के लिए शासन ने संविदा कर्मचारियों को रखा था। मजदूरों की मदद से वे रेशम के सफेद कपड़े मशीनाें में बुनते थे। कपड़ाें के साथ रेशम के कीटाें से मिलने वाले काकून से पतले धागाें का भी निर्माण किया जाता था। वन विभाग यहां बनने वाले रेशमी कपड़ों की देश भर की प्रदर्शनियों में लगाकर प्रचार प्रसार किया करता था। उच्चकोटि के रेशमी कपड़े विदेशों में भी भेजे जाते थे। 1993 तक इस टशर केंद्र में रेशमी कपड़े बुने जाते रहे। लेकिन इसी साल अचानक शासन का पत्र यहां पहुंचता है और घाटा होने के चलते टशर केंद्र बंद करने को कहा जाता है। वन प्रभाग के चौकीदार रामदुलारे यादव ने बताया कि शासन के आदेश के बाद टशर केंद्र बंद कर दिया गया। देखरेख के अभाव में कें द्र की मशीने खराब हो गई। बाद में यहां लगी मशीनें वापस मंगा ली गई और अब आलम यह है कि इसका भवन जर्जर होकर गिरने लगा है।